आईवीएलपी प्रोग्राम के भागीदार आशुतोष दत्त शर्मा से जानिए कि क्वाड सहयोग हिंद-प्रशांत क्षेत्र में महत्वपूर्ण
प्रौद्योगिकियों में तकनीकी रूप से कुशल कार्यबल के निर्माण के प्रयासों में कैसे सहायता करता है।

 

 

– सैयद सुलेमान अख्तर, स्पैन पत्रिका, अमेरिकी दूतावास नई दिल्ली
जैसे-जैसे दुनिया के देश आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई), रोबोटिक्स और साइबर सुरक्षा जैसी उभरती हुई तकनीकों
में निवेश कर रहे हैं, अमेरिका और भारत अपने क्वाड पार्टनरों ऑस्ट्रेलिया और जापान के साथ-साथ कार्यबल
विकास पर सहयोग को और मजबूत कर रहे हैं। इसमें हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भविष्य को देखते हुए कार्यबल तैयार क रने
के लिए विश्वविद्यालयों, उद्योगों और सरकारों के बीच संबंधों का निर्माण शामिल है। इस सहयोग का एक उदाहरण
अमेरिकी विदेश विभाग का इंटरनेशनल विजिटर लीडरशिप प्रोग्राम (आईवीएलपी) है, जो महत्वपूर्ण और उभरते क्षेत्रों
में पेशेवर एक्सचेंज की सुविधा प्रदान करता है।
आईवीएलपी, अमेरिकी विदेश विभाग का प्राथमिक पेशेवर एक्सचेंज प्रोग्राम है और यह अमेरिकियों एवं विभिन्न
क्षेत्रों से जुड़े अंतरराष्ट्रीय अग्रणी पेशेवरों के बीच दीर्घकालिक संबंधों का निर्माण करता है।

 

 

आशुतोष शर्मा आई-हब फाउंडेशन फॉर कोबोटिक्स (आईएचएफसी)के मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं। उन्होंने 2024 में
‘‘वर्कफोर्स डवलपमेंट फॉर क्रिटिकल एंड इमर्जिंग टेक्नोलॉजीज़ इन द क्वाड’’ विषय पर आईवीएलपी में सहभागिता
की, जहां भविष्य के लिए कार्यबल को तैयार करने में अंतरराष्ट्रीय सहयोग के बारे में उनके दृष्टिकोण को आकार
मिला।
नवाचार का आधार
कोबोटिक्स या कोलैबोरेटिव रोबोटिक्स यानी सहयोगी रोबोटिक्स, से आशय ऐसी तकनीकों से है जिसमें इंसान और
रोबोट मिलकर काम करने में सक्षम होते हैं- यह एक ऐसा क्षेत्र जो कई अत्याधुनिक विषयों के मिलन का प्रतिनिधित्व
करता है।
शर्मा स्पष्ट करते हैं, ‘‘आईएचएफसी का मिशन कोबोटिक्स के क्षेत्र में अनुसंधान, नवाचार, स्टेम (विज्ञान,
प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग एवं गणित) शिक्षा एवं उद्यमिता में सहायता करना है।’’ यह फाउंडेशन एआई, रोबोटिक्स
एवं मशीन लर्निंग जैसे प्रौद्योगिकी क्षेत्रों में उद्यमिता और अनुसंधान को बढ़ावा देने के अलावा, विद्यार्थियों एवं
स्टार्ट-अप के लिए फेलोशिप, मेंटरशिप एवं इंटर्नशिप कार्यक्रम चलाता है। यह डीप-टेक उद्यमों के विकास में
सहायता करने के लिए कौश्ल निर्माण कार्यशालाएं भी चलाता है।

आईएचएफसी डीप-टेक उपक्रमों और शिक्षा कार्यक्रमों को समर्थन के माध्यम से भारत के विकसित होते नवाचार
इकोसिस्टम में योगदान देता है। वर्तमान में फाउंडेशन 38 ऐसे शोध-आधारित स्टार्ट-अप की सहायता करता है जो
सकारात्मक सामाजिक प्रभाव पैदा करने के लिए उन्नत तकनीकों का विकास करते हैं। स्थापित उपक्रमों की
सहायता करने के अलावा आईएचएफसी स्कूलों में स्टेम आउटरीच का आयोजन करता है ताकि कोबोटिक्स और
प्रौद्योगिकी कॅरियर में शुरुआती दौर में दिलचस्पी पैदा की जा सके और भविष्य के कार्यबल के लिए बुनियाद तैयार
की जा सके।
परिवर्तनकारी अंतरराष्ट्रीय अनुभव
आईवीएलपी में शर्मा की सहभागिता से महत्वपूर्ण प्रौद्योगिकियों में विभिन्न राष्ट्रों में कार्यबल विकास के दृष्टिकोण
के बारे में उन्हें गहरी समझ मिली।
वह कहते हैं, ‘‘आईवीएलपी में भाग लेना एक परिवर्तनकारी अनुभव था। ऑस्ट्रेलिया, भारत और जापान के
प्रतिभागियों के साथ एक अंतर-क्षेत्रीय परियोजना के रूप में, इसने यह देखने का अवसर प्रदान किया कि अमेरिका
किस तरह से एक आधुनिक और तकनीकी रूप से सक्षम कार्यबल तैयार कर रहा है जो महत्वपूर्ण एवं उभरती
प्रौद्योगिकियों पर काम करने में सक्षम है।’’
कार्यक्रम से प्रतिभागियों को यह समझने का मौका मिला कि अमेरिका राष्ट्रीय सुरक्षा एवं तकनीकी प्रतिस्पर्धा के
आवश्यक क्षेत्रों में अपने कार्यबल को कैसे तैयार करता है। शर्मा और उनके साथी प्रतिभागियों को एआई, रोबोटिक्स,
क्वांटम कंप्यूटिंग और साइबर सुरक्षा जैसे उभरते क्षेत्रों का प्रत्यक्ष अनुभव प्राप्त हुआ।
विशेषज्ञों एवं संगठनों के साथ बातचीत के माध्यम से, कार्यक्रम ने क्वाड राष्ट्रों के सामने आने वाली चुनौतियों एवं
उनके व्यावहारिक समाधानों को उजागर किया। शर्मा के अनुसार, ‘‘क्वाड राष्ट्रों में विशेष रूप से उद्योग- शिक्षा
जगत एवं सरकार के बीच साझेदारी को मजबूत करने पर मजबूत एक राय देखने को मिली।’’
व्पावहारिक दृष्टिकोण
आईवीएलपी अनुभव ने कई प्रमुख दृष्टिकोणों को उजागर किया है, जिनका उपयोग अमेरिका अपने कार्यबल को
उभरती प्रौद्योगिकियों के लिए तैयार करने में करता है। शर्मा ने शैक्षणिक पाठ्यक्रम और उद्योग की जरूरतों के बीच
खाई पाटने के लिए योग्यता-आधारित प्रशिक्षण और प्रमाणन को महत्वपूर्ण उपकरण के रूप में पहचाना।
उन्होंने कहा, ‘‘निरंतर सीख को जारी रखने के लिए को-रेप्लिकेबल सेंटर्स (सीआईसी) जैसे अनुकरणीय मॉडलों के
इस्तेमाल और उद्योगों की भागीदारी की महत्वपूर्ण भूमिका सामने आई।’’ इन जानकारियों ने भारत में कार्यबल
विकास के लिए आईएचएफसी के नजरिए के पहलुओं को समझने का अवसर दिया।

 

 

आशुतोष दत्त शर्मा

‘‘निरंतर सीख को जारी रखने के लिए को-रेप्लिकेबल सेंटर्स (सीआईसी) जैसे अनुकरणीय मॉडलों के
इस्तेमाल और उद्योगों की भागीदारी की महत्वपूर्ण भूमिका सामने आई।’’ 

 

 

 

शर्मा ने इन सीखों को प्रमाणन कार्यक्रमों, प्रयोगशालाओं से बाजार तक की पहलों और ड्रोन टेक पार्क तथा मेडिकल
कोबोटिक्स सेंटर जैसे उत्कृष्टता केंद्रों के माध्यम से कार्यान्वित किया। फाउंडेशन, रोबोटिक्स प्रतियोगिताओं के
माध्यम से व्यावहारिक नवाचार को बढ़ावा देता है और शुरुआती चरण के उद्यमियों की सहायता करता है जबकि
अपस्किलिंग अवसरों, स्केलेबल प्रशिक्षण कार्यक्रमों एवं मजबूत साझेदारियों की पेशकश करके भारत एवं वैश्विक
स्तर पर प्रासंगिक सीख पर फोकस करता है।
सहयोग का दृष्टिकोण
फरवरी 2025 में अमेरिका-भारत नेतृत्व के संयुक्त वक्तव्य में राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने
मजबूत अंतरराष्ट्रीय शैक्षणिक सहयोग के माध्यम से भविष्य के लिए तैयार कार्यबल को विकसित करने के प्रति
अपने संकल्प को दोहराया था। उन्होंने संयुक्त डिग्री प्रोग्रामों, सेंटर फॉर एक्सीलेंस एवं भारत में अमेरिका के प्रमुख
शैक्षणिक संस्थानों के कैंपसों के माध्यम से उच्च शिक्षा संस्थानों के बीच सहयोग का विस्तार करने का संकल्प
लिया।
शर्मा का विश्वास है कि क्वाड राष्ट्रों के बीच सहयोग के प्रयासों की बहुत ज्यादा संभावना है। उनका कहना है, ‘‘क्वाड
में सहयोगी तकनीकी शिक्षा एवं कार्यबल विकास के वैश्विक मॉडल को सामने रखने की मजबूत क्षमता है।’’ वह कहते
हैं, ‘‘अपने प्रयासों में तालमेल लाते हुए क्वाड राष्ट्र अपनी सीमाओं से परे सेंटर्स फॉर एक्सीलेंस की स्थापना कर सकते
हैं, संयुक्त अनुसंधान एवं विकास को प्रोत्साहित कर सकते हैं एवं विद्यार्थियों के आदान-प्रदान कार्यक्रमों के अलावा,
साझा प्रशिक्षण एवं मानक प्रमाणन को विकसित कर सकते हैं।’’
वे प्रौद्योगिकी नैतिकता पर सहयोग को एक-दूसरे अवसर के रूप में देखते हैं जो राष्ट्रीय पहलों को विस्तार दे सकता
हैं एवं हिंद-प्रशांत क्षेत्र या उससे भी आगे भविष्य के लिए तैयार कार्यबल के निर्माण में सहायता दे सकता है। इस तरह
के सहयोग से न केवल तकनीकी प्रशिक्षण में मदद मिल सकती है, बल्कि यह उभरती प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में
उत्तरदायी नवाचार के लिए नैतिक प्रारूप का आधार भी तैयार कर सकता है।

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