गांव ट्रिब्यून विशेष
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देश में चुनाव प्रचार के तौर तरीकों में चुपचाप बहुत बड़े स्तर पर बदलाव हो गए हैं।ढोल-नगाड़े, लाउडस्पीकर लगे वाहन और पोस्टर आदि अब बीते ज़माने की बातें हो गई हैं। हमारा चुनाव प्रचार खामोशी के साथ कैसे बदल गया है यह वर्तमान लोकसभा चुनाव के अभी तक हुए विभिन्न चरणों में साफ दिखाई दे रहा है।चुनावी रौनक और शोरगुल कहीं भी नज़र नही आ रहा।

मौजूदा पीढ़ी के अधिकतर लोग पुराने दौर के चुनावी शोर-शराबे से पूरी तरह से अनभिज्ञ हैं जब विभिन्न दलों के उम्मीदवारों के वाहन सड़कों ज़ोर-शोर से नारे लगाते दौड़ते थे।कभी-कभी किसी चौक-चौराहे पर प्रतिद्वंद्वी उम्मीदवारों के वाहन आपने-सामने खड़े होकर एक-दूसरे के पर हल्की-फुल्की छींटाकशी व चुहलबाजी करते नज़र आ जाते थे।लेकिन अब वह सब नजारे कहीं खो गए हैं।चुनाव कब आया और कब चला गया पता लगाना मुश्किल हो गया है।

फोटो क्रेडिट टाइम्स ऑफ़ इंडिया

अभी भी याद है कैसे सुबह-सवेरे चुनाव प्रचार के लिए प्रचारकों की टोलियां वाहनों में सवार होकर निकल पड़ती थी।शहरी इलाकों में कार-जीप व ऑटो पर सवार होकर चुनावी नारे लगाते हुए प्रचारकों की टोलियों को देखना व सुनने का एक अलग ही मज़ा था।जबकि ग्रामीण क्षेत्रों में ट्रेक्टर ट्रॉलियों में बैठ कर ढोलक व अन्य वाद्य यंत्रों के साथ मज़ेदार चुनावी गीत गाते हुए धूप-बारिश और धूल आंधी की परवाह किए बिना चुनाव प्रचार करते घंटों तक प्रचारक घूमते नज़र आ जाते थे।

लोकसभा चुनाव के कई चरण पूरे हो चुके हैं। लेकिन हर तरफ से एक ही बात सुनने को मिल रही है कि चुनाव की रौनक गायब है।चुनाव के दौरान होने वाला शोरगुल दिखाई नहीं दे रहा।दिवारों से पोस्टर गुम हैं और सड़कों पर लाउडस्पीकर लगा कर सरपट दौड़ते वाहन नज़र नही आ रहे।जबकि एक ज़माना था कि किराए पर मिलने वाले लाउडस्पीकर लेने के लिए उम्मीदवारों में आपाधापी रहती, कई-कई दिन पहले लाउडस्पीकर बुक कर लिए जाते थे।

चुनाव आयोग के ताज़ा नियम भी ऐसे बन गए हैं कि चुनाव प्रचार के सभी पुराने परंपरागत तौर-तरीके खत्म होते जा रहे हैं। जो थोड़े बहुत बचे हैं वह भी आने वाले समय में पूरी तरह से लुप्त होने के कगार पर हैं।

किसी उत्सव से कम नही थे भारतीय चुनाव
हमारे देश में चुनाव किसी उत्सव से कम कभी नही रहे।जैसे ही चुनाव का ऐलान होता तो चुनाव प्रचार के लिए लाखों छोटे-छोटे कुटीर व लघु उद्योगों को कारोबार का एक बड़ा मौका मिलता।शहरों के गली-मोहल्लों, छोटे कस्बों और गांव आदि से चलने वाले ऐसे तमाम लघु उद्योगों में रौनक आ जाती और कारोबारी दिन-रात काम-धंधे में जुट जाते। छोटे-बड़े तमाम छापेखानों (प्रिंटिंग प्रेस) में पोस्टर छापने का काम युद्धस्तर पर ऐसे चलता मानो चुनाव पोस्टरों से ही जीते जाने वाले हैं।

रात को पेंटरों की टोलियां ब्रश व रंगों को लेकर दिवारों को आकर्षक रूप देने निकल पड़ती और बेजान दिवारों को ऐसा आकर्षक ढंग से नया रूप दे दिया जाता कि आम लोग कई दिनों तक उन्हें बड़े चाव से देखते रहते।
सड़क किनारे की इन दिवारों को ऐसे-ऐसे व्यंग्यात्मक नारों से भर दिया जाता की लोग उन्हें पढ़ते-पढ़ते मन ही मन गुदगुदाते रहते और उन्हीं नारों को लेकर चाय की दुकानों पर बहसें करते-करते एक-दूसरे की टांग खींचते रहते।माहौल ऐसा बन जाता कि हर कोई चुनावी रंग में रंगा नज़र आता।

बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक के सिर पर चुनाव की खुमारी तो देखने वाली होती।बच्चों के तो अंदाज ही अलग होते।बच्चों की चाल-ढाल
बदल जाती।जिसके पास जितने ज़्यादा बिल्ले (बैज) और स्टिकर वह उतना ही बड़ा ‘नेता’।
अपनी छाती पर बच्चे एक साथ अलग-अलग पार्टी के उम्मीदवारों के बिल्ले टांगे ऐसे शान से चल रहे होते जैसे सारे चुनावी दांवपेंच जानते हैं और उम्मीदवार की जीत-हार इनकी ही मुट्ठी में है ।अपने खिलौने तक बच्चे उम्मीदवारों के स्टिकर आदि से सजा लिया करते।

मगर अब चुनावी दिनों में बच्चों की टोलियां नज़र नही आती हैं और चाय की दुकानों पर बहसबाजी भी कम होने लगी है। सड़क किनारे की तमाम दिवारें सूनी व बेजान पड़ी रहती हैं। कोई उन पर रंगों से खूबसूरत आकृतियां नही उकेरता न ही चुनावी नारे अब लिखे दिखाई देते हैं।पोस्टर भी अब चुनावी मौसम में दिखना बंद होने लगे हैं।नियम इतने सख्त हैं कि उम्मीदवार चाह कर भी दिवारों पर पोस्टर नहीं लगा सकता।

लघु उद्योग संकट में

चुनाव प्रचार की बदलती शैली और चुनाव आयोग की कड़ी पाबंदियों की वजह से कुटीर व लघु उद्योगों पर बहुत बड़ी मार पड़ी है। कुटीर व लघु उद्योगों के सम्मुख अपने अस्तित्व को बनाए रखने का बहुत बड़ा संकट आ खड़ा हुआ है।कई कुटीर व लघु उद्योग लगभग समाप्त होने के कगार पर पहुंच गए हैं।पोस्टर, दिवारों पर लिखाई, स्टिकर, बिल्ले, आदि पूरी तरह से बंद हो गए हैं या बड़े स्तर पर कम हो गए हैं।हर चुनाव में करोड़ों रुपये का जो कारोबार हुआ करता था वह अब चुपके से खत्म हो रहा है।

अगर हम सिर्फ जम्मू की बात करें तो जम्मू की हर-छोटी बड़ी प्रिंटिंग प्रेस 20 से 30 लाख का व्यापार हर चुनाव में आराम से कर लिया करती थी।लेकिन अब इन छापाखानों में चुनावी दिनों में सन्नाटा पसरा हुआ है।

दिवारों पर उम्मीदवारों के पक्ष में प्रचार सामग्री लिखने या चिपकाने पर भी चुनाव आयोग द्वारा इस बार से प्रतिबंध लगा दिया गया है।
इस प्रतिबंध की वजह से कुटीर व लघु उद्योगों पर बहुत बड़ी मार पड़ी है।पेंटरों को इस चुनाव में कोई काम नही मिला।

दरअसल हमारे चुनाव अब पूरी तरह से बदल गए हैं।सूचना क्रांति का पूरा असर चुनाव पर दिखने लगा है।चुनाव प्रचार का बहुत बड़ा हिस्सा अब मोबाइल में ही सिमटने लगा है।उम्मीदवार व्हाटसएप आदि माध्यमों से मतदाताओं से संपर्क साधने की कोशिश कर रहे हैं।आधुनिक तकनीक आने के बाद से चुनाव प्रचार का रंग व ढंग दोनों पूरी तरह से नया रूप ले चुके हैं। चुनाव आयोग के नए नियम भी ऐसे हैं कि सारा ज़ोर नई व आधुनिक तकनीक पर दिया जा रहा है।एक तरह से सारा प्रचार अब डिजिटल होता जा रहा है।आने वाले वर्षों में और भी बड़े बदलाव संभव हैं।

हालांकि यह भी ठीक है कि शोरगुल से और दिवारों को रंगने-पोतने को लेकर कई तरह के नुक्सान होते थे और इन सब पर लंबी बहस भी चलती रही है ।कुछ पर्यावरण व ध्वनि प्रदूषण से जुड़े मुद्दे भी थे।
मगर यह भी सच है कि परंपरागत चुनाव प्रचार के तौर-तरीकों से चुनाव का जो माहौल बनता था वह अब नही बनता।कोई माने या न माने पहले के चुनाव प्रचार से हर कोई चुनाव के रंग में रंग जाता था जो अब नही हो पाता।

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