5 अगस्त 2025 को, भारतीय राजनीति के एक विवादास्पद राजनीतिक नेता, सत्यपाल मलिक का निधन हो गया, जो जम्मू और कश्मीर के पूर्व और अंतिम गवर्नर थे। उनका निधन दिल्ली के राम मनोहर लोहिया अस्पताल में हुआ, जहाँ वे किडनी से संबंधित बीमारियों और मूत्र मार्ग के संक्रमण से पीड़ित थे।
पूर्व गवर्नर चौधरी सत्यपाल सिंह मलिक जी नहीं रहें।#satyapalmalik
— Satyapal Malik (@SatyapalMalik6) August 5, 2025
79 वर्षीय मलिक ने अपने लंबे राजनीतिक करियर में कई महत्वपूर्ण पदों पर कार्य किया, लेकिन उनके विवादास्पद बयानों, विशेष रूप से 2019 के पुलवामा आतंकवादी हमले और किरु जलविद्युत परियोजना से संबंधित भ्रष्टाचार के आरोपों ने उन्हें सुर्खियों में रखा।
Saddened by the passing away of Shri Satyapal Malik Ji. My thoughts are with his family and supporters in this hour of grief. Om Shanti.
— Narendra Modi (@narendramodi) August 5, 2025
राजनीतिक यात्रा
सत्यपाल मलिक का जन्म उत्तर प्रदेश के बागपत जिले के हिसावदा गाँव में एक जाट परिवार में हुआ था। उन्होंने मेरठ विश्वविद्यालय से बीएससी और एलएलबी की डिग्री प्राप्त की और 1968-69 में छात्रसंघ अध्यक्ष के रूप में अपने राजनीतिक जीवन की शुरुआत की। 1974 में, उन्होंने चौधरी चरण सिंह की भारतीय क्रांति दल के टिकट पर बागपत से विधायक का चुनाव जीता, जहाँ उन्होंने 42.4% वोट हासिल किए। बाद में, उन्होंने भारतीय लोक दल में शामिल होकर इसके महासचिव के रूप में कार्य किया।

मलिक ने 1980-1986 और 1986-1989 तक उत्तर प्रदेश से राज्यसभा सांसद के रूप में सेवा की। 1989-1991 तक, वे जनता दल के टिकट पर अलीगढ़ से नौवीं लोकसभा के सांसद रहे। उनके राजनीतिक करियर में कई पार्टियों में बदलाव देखने को मिले, जिसमें कांग्रेस, लोक दल, और समाजवादी पार्टी शामिल हैं। 2004 में, वे भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) में शामिल हुए और 2012 में इसके राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बने।

मलिक ने कई राज्यों में गवर्नर के रूप में कार्य किया, जिसमें बिहार (2017-2018), ओडिशा (अतिरिक्त प्रभार, 2018), जम्मू और कश्मीर (2018-2019), गोवा (2019-2020), और मेघालय (2020-2022) शामिल हैं। जम्मू और कश्मीर में उनके कार्यकाल के दौरान, 5 अगस्त 2019 को केंद्र सरकार ने अनुच्छेद 370 और 35-ए को निरस्त कर दिया, जिसके परिणामस्वरूप राज्य को दो केंद्र शासित प्रदेशों में विभाजित किया गया। यह वह समय था जब बीजेपी ने पीडीपी के नेतृत्व वाली गठबंधन सरकार से समर्थन वापस ले लिया था, जिसके बाद गवर्नर शासन लागू हुआ। मलिक का कार्यकाल 2019 के पुलवामा आतंकवादी हमले के साथ भी जुड़ा हुआ है, जिसमें 40 सीआरपीएफ कर्मियों की जान गई थी।
बहुत कम ही लोग हैं जो मोदी शाह और उनके अंदर काम कर रही एजेंसियों के डर से कुछ बोल पाते हैं।
सत्यपाल मलिक जी ने हिम्मत दिखाई थी और देश के नागरिकों को पुलवामा हमले के बारे में उनके पास जितनी जानकारी थी वो पहुंचाई।
आज उन्होंने RML अस्पताल में अंतिम सांस ली।
ओम शांति 🙏🏻 pic.twitter.com/baFvrS6yOf
— Ritu Choudhary (@RituChoudhryINC) August 5, 2025
विवाद
सत्यपाल मलिक अपने बयानों के कारण अक्सर विवादों में रहे, जिनमें से कुछ ने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ध्यान आकर्षित किया।
पुलवामा आतंकवादी हमला
14 फरवरी 2019 को जम्मू और कश्मीर के पुलवामा जिले में एक आत्मघाती हमलावर ने सीआरपीएफ के काफिले पर हमला किया, जिसमें 40 जवान शहीद हो गए। मलिक, जो उस समय जम्मू और कश्मीर के गवर्नर थे, ने बाद में दावा किया कि इस हमले में सरकारी एजेंसियों की गंभीर चूक थी। एक साक्षात्कार में, उन्होंने कहा कि सीआरपीएफ ने अपने कर्मियों को हवाई मार्ग से ले जाने के लिए पांच विमानों का अनुरोध किया था, क्योंकि इतना बड़ा काफिला (78 वाहनों में 2,500 से अधिक कर्मी) आमतौर पर सड़क मार्ग से नहीं जाता। हालांकि, गृह मंत्रालय ने इस अनुरोध को अस्वीकार कर दिया, जिसके कारण कर्मियों को सड़क मार्ग से यात्रा करनी पड़ी।
पूर्व राज्यपाल सत्यपाल मलिक जी के निधन की ख़बर सुनकर बेहद दुख हुआ।
मैं उन्हें हमेशा एक ऐसे इंसान के रूप में याद करूंगा, जो आख़िरी वक्त तक बिना डरे सच बोलते रहे और जनता के हितों की बात करते रहे।
मैं उनके परिवारजनों, समर्थकों और शुभचिंतकों के प्रति गहरी संवेदनाएं व्यक्त करता हूं। pic.twitter.com/raENEwDCjK
— Rahul Gandhi (@RahulGandhi) August 5, 2025
मलिक ने यह भी आरोप लगाया कि हमले के बाद, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोभाल ने उन्हें इन चूकों के बारे में चुप रहने का निर्देश दिया। उन्होंने दावा किया कि उन्होंने हमले के दिन ही प्रधानमंत्री को सूचित किया था कि यह हमला सरकार की विफलता के कारण हुआ, लेकिन उन्हें “अब चुप रहने” के लिए कहा गया। इन बयानों ने राजनीतिक तूफान खड़ा कर दिया। विपक्षी दलों, विशेष रूप से कांग्रेस, ने इन आरोपों का उपयोग सरकार की राष्ट्रीय सुरक्षा नीतियों पर सवाल उठाने के लिए किया। यहाँ तक कि पाकिस्तान ने मलिक के बयानों का हवाला देकर भारत के खिलाफ अपनी कहानी को मजबूत करने की कोशिश की, जिससे यह मुद्दा और भी विवादास्पद हो गया।
सत्यपाल मलिक के जम्मू और कश्मीर गवर्नर कार्यकाल के दौरान फैक्स विवाद
- सत्यपाल मलिक, जो 23 अगस्त 2018 से 30 अक्टूबर 2019 तक जम्मू और कश्मीर के अंतिम गवर्नर थे, अपने कार्यकाल के दौरान कई विवादों में उलझे। इनमें से एक प्रमुख विवाद था “फैक्स विवाद”, जिसने राजनीतिक हलकों में खासी हलचल मचाई। यह विवाद जम्मू और कश्मीर में गवर्नर शासन लागू होने और विधानसभा भंग करने के निर्णय से जुड़ा था, जिसमें एक कथित “फैक्स मशीन खराब” होने की बात सामने आई। इसने न केवल मलिक के फैसले पर सवाल उठाए, बल्कि क्षेत्र की राजनीतिक स्थिरता और प्रक्रिया की पारदर्शिता पर भी बहस छेड़ दी।
- पृष्ठभूमि
- जून 2018 में, भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) ने जम्मू और कश्मीर में पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) के साथ गठबंधन तोड़ लिया, जिसके बाद महबूबा मुफ्ती के नेतृत्व वाली सरकार गिर गई। इसके परिणामस्वरूप, राज्य में गवर्नर शासन लागू हुआ, और सत्यपाल मलिक को अगस्त 2018 में गवर्नर नियुक्त किया गया। उस समय, जम्मू और कश्मीर की विधानसभा निलंबित थी, और नई सरकार के गठन की संभावनाएँ तलाशी जा रही थीं।
- 21 नवंबर 2018 को, मलिक ने अचानक विधानसभा भंग करने का फैसला लिया, जिसके बाद यह विवाद शुरू हुआ। यह निर्णय तब लिया गया जब पीडीपी, नेशनल कॉन्फ्रेंस (एनसी), और कांग्रेस ने मिलकर सरकार बनाने का दावा पेश करने की कोशिश की थी। इस घटनाक्रम में एक फैक्स मशीन की कथित खराबी ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, जिसे लेकर मलिक के बयान ने विवाद को और हवा दी।
- फैक्स विवाद का विवरण
- नवंबर 2018 में, पीडीपी नेता महबूबा मुफ्ती ने दावा किया कि उनकी पार्टी, नेशनल कॉन्फ्रेंस और कांग्रेस के समर्थन से सरकार बनाने के लिए पर्याप्त विधायकों का समर्थन हासिल है। मुफ्ती ने गवर्नर मलिक को एक पत्र भेजा, जिसमें 56 विधायकों के समर्थन का दावा किया गया था। यह पत्र फैक्स और ईमेल के माध्यम से राजभवन को भेजा गया था, क्योंकि गवर्नर से तत्काल संपर्क संभव नहीं था।
- हालांकि, मलिक ने दावा किया कि उन्हें यह फैक्स प्राप्त नहीं हुआ, क्योंकि राजभवन की फैक्स मशीन “खराब” थी। उन्होंने यह भी कहा कि उन्हें मुफ्ती का पत्र समय पर नहीं मिला, और इसलिए उन्होंने विधानसभा भंग करने का निर्णय लिया। मलिक ने तर्क दिया कि सरकार बनाने के लिए कोई औपचारिक दावा उनके समक्ष नहीं आया, और राजनीतिक अस्थिरता को रोकने के लिए विधानसभा भंग करना आवश्यक था।
- इसके जवाब में, महबूबा मुफ्ती ने मलिक के दावे पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि पत्र न केवल फैक्स, बल्कि ईमेल और व्हाट्सएप के माध्यम से भी भेजा गया था, और यह असंभव है कि गवर्नर को यह प्राप्त न हुआ हो। मुफ्ती ने आरोप लगाया कि मलिक ने जानबूझकर उनके दावे को नजरअंदाज किया और केंद्र सरकार के इशारे पर विधानसभा भंग की, ताकि विपक्षी दलों को सरकार बनाने से रोका जा सके।
किरु जलविद्युत परियोजना में घूस का आरोप
2021 में, जब मलिक मेघालय के गवर्नर थे, उन्होंने एक और सनसनीखेज दावा किया कि उन्हें किरु जलविद्युत परियोजना से संबंधित दो फाइलों को मंजूरी देने के लिए ₹300 करोड़ की घूस की पेशकश की गई थी। उन्होंने आरोप लगाया कि यह पेशकश एक वरिष्ठ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) कार्यकर्ता द्वारा की गई थी। इस बयान ने बीजेपी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार को असहज स्थिति में डाल दिया, क्योंकि मलिक स्वयं बीजेपी से जुड़े रहे थे। इस दावे ने भ्रष्टाचार के आरोपों को हवा दी और बाद में सीबीआई जांच का आधार बना।
सीबीआई जांच
मई 2025 में, केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) ने किरु जलविद्युत परियोजना में कथित भ्रष्टाचार के संबंध में सत्यपाल मलिक और पांच अन्य लोगों के खिलाफ एक चार्जशीट दायर की। इस परियोजना में ₹2,200 करोड़ के नागरिक कार्य अनुबंधों को प्रदान करने में अनियमितताओं का आरोप था। फरवरी 2024 में, सीबीआई ने मलिक से जुड़े 30 स्थानों पर छापेमारी की, जिसमें गुरुग्राम में तीन फ्लैट और दिल्ली के एशियाड गेम्स विलेज में एक अपार्टमेंट शामिल थे। अन्य स्थानों में चंडीगढ़, पटना, जोधपुर, बाड़मेर, जम्मू और कश्मीर, नोएडा, और बागपत शामिल थे।
सीबीआई की कार्रवाई मलिक के स्वयं के उस दावे के बाद शुरू हुई, जिसमें उन्होंने घूस की पेशकश की बात कही थी। मलिक के समर्थकों ने इन जांचों को राजनीति से प्रेरित बताया, जबकि आलोचकों का कहना था कि मलिक ने अपने बयानों से सरकार को असहज करने की कोशिश की, जिसके कारण उनके खिलाफ कार्रवाई हुई।
अन्य उल्लेखनीय बयान
मलिक ने अपने गवर्नर कार्यकाल के बाद कई अन्य मुद्दों पर भी सरकार की आलोचना की। 2021 में, उन्होंने किसान आंदोलन का समर्थन करते हुए कहा कि दिल्ली के नेता “कुत्ते की मृत्यु पर शोक व्यक्त करते हैं, लेकिन किसानों की मृत्यु पर नहीं।” उन्होंने सेंट्रल विस्टा पुनर्विकास योजना की भी आलोचना की, यह कहते हुए कि इसके बजाय एक विश्वस्तरीय कॉलेज बनाना बेहतर होता। मलिक ने यह भी दावा किया कि उन्हें केंद्र के खिलाफ बोलना बंद करने पर उपराष्ट्रपति बनाने का संकेत दिया गया था।
2023 में, उन्होंने सिख समुदाय की धैर्य की सीमा को परखने के खिलाफ सरकार को चेतावनी दी, जिसका उपयोग सिद्धू मूसेवाला के एक गीत में किया गया। ये बयान मलिक की उस छवि को और मजबूत करते हैं, जिसमें वे सरकार के खिलाफ खुलकर बोलने वाले नेता के रूप में देखे जाते थे।
स्वास्थ्य और निधन
मलिक लंबे समय से किडनी की बीमारी और मूत्र मार्ग के संक्रमण से जूझ रहे थे। मई 2025 में, उन्हें राम मनोहर लोहिया अस्पताल में भर्ती किया गया था, जहाँ उनकी हालत गंभीर बनी रही। उन्होंने सोशल मीडिया पर अपनी स्वास्थ्य स्थिति के बारे में अपडेट साझा किए, जिसमें उन्होंने बताया कि उनके दोनों किडनी ने काम करना बंद कर दिया था और वे डायलिसिस पर थे। 5 अगस्त 2025 को, लगभग दोपहर 1 बजे, उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके पार्थिव शरीर को दिल्ली के आरके पुरम स्थित उनके निवास पर ले जाया गया, और अंतिम संस्कार 6 अगस्त को लोधी श्मशान घाट में किया गया।
