गांव ट्रिब्यून विशेष
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अनंतनाग-राजौरी लोकसभा सीट पर चुनाव प्रचार अपने पूरे चरम पर है। चुनाव प्रचार में जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती ने निश्चित रूप से अपने प्रतिद्वंद्वियों पर भारी साबित हो रही हैं।लोकप्रियता में महबूबा ने शुरुआत से ही बढ़त बनाई हुई हैं, विशेषकर महिला मतदाताओं में महबूबा की लोकप्रियता की काट उनके प्रतिद्वंद्वियों को नही मिल रही
है ।महबूबा की बेटी इल्तिजा मुफ्ती द्वारा अपनी मां के लिए किए जा रहे चुनाव प्रचार
का भी बहुत ज़बरदस्त असर दिखाई दे रहा है।

यही नही कश्मीरी भाषी और कश्मीर की प्रमुख राजनीतिक हस्ती होने का फायदा भी महबूबा के साथ है। महत्वपूर्ण तथ्य है कि पहाड़ी-गुज्जर और कश्मीरी भाषी के बीच रहने वाले राजनीतिक टकराव का लाभ भी महबूबा को मिल रहा है।चुनाव मैदान में महबूबा मुफ्ती अपने प्रतिद्वंदियों को लगभग हर जगह में कड़ी टक्कर दे रही हैं।
महिला मतदाताओं में लोकप्रियता के साथ-साथ महबूबा को कश्मीरी भाषी होने का भी भरपूर लाभ मिल रहा है। महबूबा इससे पहले 2014 में अनंतनाग से चुनाव जीत कर लोकसभा जा चुकी हैं।

 

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महबूबा के सामने मैदान में नेशनल कांफ्रेस ने गुज्जर नेता मियां अल्ताफ को उतारा हुआ है।लेकिन उन्हें गुज्जर-पहाड़ी के राजनीतिक मतभेद से उन्हें हानि उठानी पड़ सकती है।

उल्लेखनीय है कि पुंछ-राजौरी में गुज्जर-पहाड़ी के बीच के राजनीतिक विवाद का एक लंबा इतिहास रहा है। लगभग हर चुनाव में यह विवाद उभर कर सामने आता है। लेकिन इस बार के चुनाव में दोनों प्रमुख समुदायों में विभाजन पहले से ओर भी बड़ा दिख रहा है।हाल ही में केंद्र द्वारा पहाड़ियों को अनुसूचित जनजाति व आरक्षण का दर्जा दिए जाने के बाद दोनों समुदायों में खाई गहरी हुई है।

 

गुज्जर समुदाय लगातार पहाड़ियों को अनुसूचित जनजाति व आरक्षण का दर्जा दिए जाने का विरोध करता रहा है। इस विरोध का नुक्सान चुनाव में नेशनल कांफ्रेंस प्रत्याशी मियां अल्ताफ को निश्चित रूप से उठाना पड़ सकता है। हालांकि नेशनल कांफ्रेस के उम्मीदवार गुज्जर नेता मियां अल्ताफ की अपने समुदाय में बहुत जबरदस्त पकड़ है। एक धार्मिक गद्दी के साथ जुड़े होने का लाभ भी उन्हें मिल रहा है मगर मतदाताओं का संख्या बल और लोकप्रियता का पैमाना महबूबा मुफ्ती के ही पक्ष में नज़र आ रहा है।

गुज्जर समुदाय के अतिरिक्त कश्मीरी भाषी लोग भी पहाड़ियों को अनुसूचित जनजाति व आरक्षण का दर्जा दिए जाने का हमेशा विरोध करते रहे हैं। लेकिन गुज्जर और पहाड़ी के बीच मतभेद इतने गहरे हैं कि पुंछ-राजौरी के पहाड़ी एक गुज्जर के मुकाबले अपना वोट किसी कश्मीरी भाषी को देने में कभी भी
हिचकिचाएंगे नहीं ।

आबादी का अनुपात भी ऐसा है कि महबूबा को साफ तौर पर लाभ मिलता नज़र आ रहा है। अनंतनाग-राजौरी लोकसभा सीट में कुल मतदाताओं की संख्या लगभग 18.29 लाख है। पांच ज़िलों में सिमटी इस लोकसभा सीट में कश्मीर घाटी के तीन ज़िलों- अनंतनाग, कुलगाम और शोपियां के मतदाताओं की संख्या लगभग 12 लाख है जबकि जम्मू संभाग के दो ज़िलों- पुंछ व राजौरी में लगभग छह लाख मतदाता हैं।

इल्तिजा निभा रही हैं प्रमुख भूमिका
महबूबा मुफ्ती को उनकी बेटी इल्तिजा मुफ्ती द्वारा की जा रही मेहनत का भी ज़बरदस्त लाभ मिल रहा है।उल्लेखनीय है कि महबूबा के चुनाव प्रचार का जिम्मा उनकी बेटी इल्तिजा मुफ्ती ने संभाल रखा है।युवाओं में इल्तिजा बहुत लोकप्रिय हैं और युवा उन्हें सुनने के लिए बड़ी संख्या में आ रहे हैं।इल्तिजा मुफ्ती चुनाव प्रचार के लिए सोशल मीडिया का भी खूब इस्तेमाल कर रही हैं।देखने में आ रहा है कि इस सीट पर सोशल मीडिया का सबसे बेहतर इस्तेमाल इल्तिजा ही कर रही है।
तकनीक का सही तरीके से इस्तेमाल करते हुए इल्तिजा सीधे मतदाताओं तक पहुंचने में कामयाब रही हैं।विशेषकर युवा उन्हें अपना समर्थन दे रहे हैं।

घाटी की तीनों लोकसभा सीटों पर हो रहे चुनाव में अनंतनाग-राजौरी सीट जाने अनजाने में सबसे प्रतिष्ठित व महत्वपूर्ण सीट में बन गई है। इस सीट से जम्मू-कश्मीर की पूर्व मुख्यमंत्री व पीपुल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) की प्रमुख महबूबा मुफ्ती का सीधा मुकाबला नेशनल कांफ्रेंस के उम्मीदवार गुज्जर नेता मियां अल्ताफ से हो रहा है।
वैसे चुनाव मैदान में जम्मू-कश्मीर ‘अपनी पार्टी’ के प्रत्याशी ज़फर मन्हास और डेमोक्रेटिक प्रोग्रेसिव आज़ाद पार्टी के महोम्मद सलीम पर्रे भी हैं।

अनंतनाग-राजौरी सीट सहित कांग्रेस कश्मीर घाटी की तीनों सीटों पर नेशनल कांफ्रेंस का समर्थन कर रही है जबकि भारतीय जनता पार्टी ने घाटी की किसी भी सीट से चुनाव न लड़ने का फैसला लिया है।

 

बदल गया है अनंतनाग लोकसभा सीट का नक्शा

उल्लेखनीय है कि परिसीमन के बाद अनंतनाग-राजौरी लोकसभा सीट का आकार व स्वरूप अब बदल चुका है।अनंतनाग-राजौरी लोकसभा सीट को 2022 तक केवल अनंतनाग लोकसभा सीट के रूप में जाना जाता था। मगर नए परिसीमन में कश्मीर घाटी की इस सीट के साथ जम्मू संभाग के दो ज़िलों-पुंछ व राजौरी के एक बड़े हिस्से को भी जोड़ दिया गया। अब कश्मीर घाटी के तीन ज़िलों – कुलगाम, शोपियां और अनंतनाग के साथ जम्मू संभाग के पुंछ व राजौरी ज़िले को मिलाकर एक लोकसभा सीट बनती है। यह लोकसभा सीट कुल 18 विधानसभा क्षेत्रों में फैली हुई है।

नए आकार के साथ पहली बार अनंतनाग-राजौरी लोकसभा सीट पर चुनाव होने जा रहा है। भौगोलिक, सांस्कृतिक, भाषाई व राजनीतिक विविधता लिए हुए इस नई लोकसभा सीट का चुनाव परिणाम निश्चित रूप से जम्मू-कश्मीर की भविष्य की राजनीति पर गहरा प्रभाव छोड़ेगा। इस सीट पर यहां एक तरफ कश्मीर की परंपरागत प्रभुत्व वाली राजनीति का गहरा असर हैं वहीं दूसरी ओर पुंछ व राजौरी ज़िलों की वर्षों पुरानी कश्मीर विरोध पर टिकी राजनीति का प्रभाव साफ तौर पर दिखाई देता है। दोनों क्षेत्र भले ही भौगोलिक रूप से एक-दूसरे से बहुत दूर न हो मगर सांस्कृतिक, भाषाई, सामाजिक, व्यापारिक व राजनीतिक रूप से दोनों ही हिस्सों में बहुत बड़ी खाई है। हालांकि पुंछ-राजौरी ज़िलों की बहुसंख्यक आबादी मुस्लिम ही है मगर बावजूद इसके कश्मीर घाटी के साथ इस आबादी का किसी भी तरह का संबंध कभी भी नही रहा।

यहां तक कि आम सामाजिक रिश्तों में भी सामंजस्य की कमी दिखाई देती रही है। घाटी व पुंछ-राजौरी ज़िलों के बीच कभी भी किसी भी तरह की समानता नज़र नही आई है, राजनीतिक रूप से तो बिलकुल भी नही। दोनों ही हिस्सों के रास्ते हमेशा से अलग-अलग रहे हैं। आतंकवाद के दिनों में जब कश्मीर घाटी में हुर्रियत कांफ्रेंस जैसे अलगाववादी संगठनों का बोलबाला था उस समय भी पुंछ-राजौरी ज़िलों में कभी भी हुर्रियत कांफ्रेंस जैसे संगठनों को कभी भी समर्थन नही मिला।
लेकिन तमाम तरह की असमानताओं व विपरीत राजनीतिक दृष्टिकोण के बावजूद अब वास्तविकता यही है कि जम्मू संभाग के पुंछ व राजौरी जिले अनंतनाग लोकसभा सीट का एक हिस्सा बन चुके हैं।
अनंतनाग-राजौरी सीट पर मतदान छठे चरण में 25 मई को होने वाला है। इस सीट पर पहले तीसरे चरण में सात मई को मतदान होना था मगर बाद में कुछ दलों की मांग पर चुनाव आयोग ने मतदान का दिन बदल दिया।

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