गांव ट्रिब्यून विशेष
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कुछ वर्ष पहले दो फिल्म आईं थी – ‘गुड़गांव’ व ‘औरंगज़ेब’, दोनों ही फिल्में अपराध की दुनिया की पृष्ठभूमि पर आधारित थीं।दोनों ही फिल्मों में बताया गया था कि कैसे गुरू द्रोणाचार्य की धरती गुरुग्राम यानी गुड़गांव भूमाफिया व पुलिस की मिलीभगत का शिकार हुआ और कैसे गुड़गांव की गगनचुंबी इमारतों के नीचे खून के रिश्ते तक दफन होते चले गए। एक आधुनिक शहर बनने की होड़ में कैसे गुड़गांव में भाई ने भाई का और बाप ने बेटे तक का कत्ल कर डाला।’गुडगांव’ फिल्म में ज़मीन व संपत्ति की जद्दोजहद में रिश्तों को तार-तार होते दिखाया गया है। पहले भाई ही भाई की हत्या करता नज़र आता है व बाद में जैसे-जैसे कहानी आगे बढ़ती है तो भाई द्वारा बहन की हत्या दिखाई गई है। जबकि मां ही अपने बेटे की हत्या करके कहानी का अंत करती है।
इसी तरह से फिल्म ‘औरंगज़ेब’ में भूमाफिया के साथ सांठगांठ कर चुका पुलिस आयुक्त करवाचौथ के दिन अपने ही पुलिस अधिकारी बेटे की हत्या कर देता है।
‘गुड़गांव’ व ‘औरंगज़ेब’ में जो दर्शाया गया था लगभग वैसा ही मंदिरों के शहर- जम्मू में भी पिछले कुछ वर्षों से दोहराया जा रहा है। भूमाफिया को जिस तरह से संरक्षित किया जा रहा है उससे हर दिन एक नई कहानी सुनने व देखने को मिल रही है।
जम्मू नगर के ग्रेटर कैलाश इलाके में एक ज़मीनी विवाद में जिस तरह से एक युवक अवतार सिंह की हत्या कर दी गई उससे पुलिस, नौकरशाही व भूमाफिया के बीच के रिश्तों की एक बार फिर से पोल खुल गई है।एक सेवानिवृत्त पुलिस अधिकारी व एक भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) के एक वरिष्ठ अधिकारी का जिस तरह से इस मामले में नाम उछला है उससे यह साफ तौर ज़ाहिर हो गया है कि जम्मू भी किस तेज़ी के साथ ज़मीनी विवादों का गढ़ बनता जा रहा है।अगर यूं कहें कि जम्मू भी ‘गुड़गांव’ बन रहा है तो गलत नही होगा।
पुलिस व राजस्व विभाग के कुछ अधिकारियों के साथ भूमाफिया का गठजोड़ सबसे पहले नब्बे के दशक में उस समय सामने आना शुरू हुआ जब जम्मू-कश्मीर में आतंकवाद ने दस्तक दी। बड़ी संख्या में कश्मीर घाटी सहित पर्वतीय क्षेत्रों से जब लोगों का पलायन शुरू हुआ तो जम्मू जैसे छोटे शहर में देखते ही देखते ज़मीनों की कीमतों में बढ़ोतरी होने लगी। कुछ एक किलोमीटर के दायरे में जो शहर था उसका दायरा हर दिशा की ओर बढ़ने लगा। जम्मू नगर एक तरफ सांबा तक पहुंच गया तो दूसरी ओर जम्मू नगर की सीमा बढ़कर अखनूर को छूने लगी।कुछ ही वर्षों में कई गांव जम्मू नगर में समा गए।
लंबे समय तक राज्यपाल व बाद में राष्ट्रपति शासन लागू रहने के कारण बाबू लोगों का बोलबाला रहा ।नौकरशाही, पुलिस व भूमाफिया के घालमेल ने एक ऐसा खेल खेला कि जम्मू नगर कब एक छोटे से शहर से महानगर बन गया पता ही नही चला ।एक समय ऐसा भी आया जब खुलेआम कुछ पुलिस अधिकारी अपने दफतरों से ज़मीन के सौदे करते देखे गए।
मगर इस सबके बीच एक दिलचस्प तथ्य यह भी देखने में आया कि कई अन्य राज्यों के मुकाबले जम्मू कश्मीर में राजनीतिक नेता ज़मीन के धंधों से दूर रहे।कुछ एक अपवाद छोड़ दिए जाएं तो यह साफ तौर पर नज़र आता है कि जम्मू कश्मीर में प्रशासनिक व पुलिस अधिकारियों की ज़मीन के सौदों के दलदल में ज़्यादा संलिप्तता पाई गई है।
हाल ही में जम्मू के ग्रेटर कैलाश में हुए ज़मीनी विवाद में भी एक बड़े प्रशासनिक अधिकारी व एक सेवानिवृत्त पुलिस अधिकारी का नाम जिस तरह से सामने आया है उससे अधिकारियों व भूमाफिया की मिलीभगत का एक बड़ा सबूत सामने आया है।
भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस)का यह अधिकारी एक महत्वपूर्ण पद पर तैनात हैं । इस अधिकारी पर पहले भी इस तरह के आरोप लगते रहे हैं।इस अधिकारी का एक करीबी रिश्तेदार जम्मू में ज़मीन के धंधे में एक जाना पहचाना नाम है
इस अधिकारी के अलावा इस समय भारतीय प्रशासनिक सेवा व पुलिस के चार से पांच बड़े अन्य अधिकारी ऐसे हैं जो खुलेआम ज़मीन के धंधे से जुड़े हुए हैं और जिनका भूमाफिया से सीधा संबंध है।
भले ही अवतार सिंह की हत्या ने भूमाफिया व पुलिस अधिकारियों व प्रशासनिक अधिकारियों की सांठगांठ उजागर कर दी है मगर इस मिलीभगत का कभी अंत हो पाएगा इसमें शक है।