गांव ट्रिब्यून विशेष

कुछ दिन पहले हमने पुराने जम्मू शहर के पक्की ढक्की मुहल्ले में हुए एक खौफनाक हत्याकांड के बारे में बताया था। नब्बे के दशक में हुई इस घटना में काला नाम का एक बदमाश मारा गया था।इस घटना ने पूरे जम्मू शहर को दहला दिया था।घटना के बाद जम्मू शहर की अपराध की दुनिया पूरी तरह से बदल गई थी।

काले की हत्या के बाद जम्मू के अपराध जगत में एक नया नाम उभरा-बिल्लू।ज़ुल्म की दुनिया में दाखिल होने वाला बिल्लू कोई और नहीं बल्कि काले का ही सबसे छोटा सगा भाई था। बिल्लू का ज़ुल्म की दुनिया में दाखिल होना और बाद में बिल्लू डॉन बनने के सफर की कहानी काफी दिलचस्प और फिल्मी थी।

काले की हत्या के बाद जब उसका अंतिम संस्कार हो रहा था तो काले के सबसे छोटे भाई बिल्लू ने हत्या का बदला लेने के लिए बकायदा भाई की जलती चिता पर हाथ रख कर कसम खाई।

 

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काले की हत्या तक बिल्लू एक सामान्य युवक था। अपराध जगत से बिल्लू का दूर-दूर तक कुछ भी लेना देना नही था।अपनी ज़िंदगी में मस्त था।न किसी से कोई लड़ाई न झगड़ा।आज भी इस बात पर यकीन करना मुश्किल हो जाता है कि बिल्लू नाम का जो लडका जम्मू के मुबारक मंडी इलाके में (पुराने अदालत परिसर के पास) अपने पिता के चाय व कुलचे-छोले के खोखे पर पिता के काम में हाथ बंटाया करता था, वे जम्मू का बहुत बड़ा डॉन बन गया।भाई के कत्ल ने उसकी पूरी ज़िंदगी बदल दी।

बिल्लू द्वारा अपराध की दुनिया में कदम रखने से जम्मू शहर के अपराध जगत का नक्शा पूरी तरह से बदल गया।तंग गलियों से लेकर बड़े व मशहूर बाज़ारों तक में आम लोग अपने को असुरक्षित महसूस करने लगे।पुलिस बुरी तरह से असहाय नज़र आने लगी।दिनदहाड़े जम्मू की गलियों व सड़कों पर खूनी वारदातें होने लगीं।

 

बड़े भाई की हत्या से आहत बिल्लू ने बदला लेने की ठान रखी थी।उसने हर उस व्यक्ति तक पहुंचने की कोशिश की जिसने काले की हत्या में हल्की सी भूमिका भी निभाई थी।बिल्लू के आतंक का कई लोग शिकार हुए। कई हत्याएं हुईं।नगर के कच्ची छावनी इलाके में एक प्रिंटिंग प्रेस के भीतर की गई हत्या से शहर कांप उठा।बिल्लू ने बकायदा एक गैंग बना लिया और लगभग हर दूसरे दिन बिल्लू गैंग की तरफ से कोई न कोई वारदात अंजाम दे दी जाती। लंबे समय तक शहर में बिल्लू और उसके गैंग का आतंक बना रहा।

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उन दिनों कई लोगों पर जानलेवा हमले हुए।मुबारक मंडी स्थित दिवान बद्रीनाथ विद्या मंदिर स्कूल के ठीक सामने एक वरिष्ठ उपायुक्त स्तर के अधिकारी के बेटे पर तेज़धार हथियारों से भयानक हमला किया गया।खून से लथपथ अधिकारी का बेटा सड़क पर पड़ा तड़पता रहा लेकिन उसे अस्पताल तक पहुंचाने की किसी की हिम्मत नही हुई।आखिर सड़क पर घायल पड़े अधिकारी के बेटे को उसके एक रिश्तेदार ने ऑटो में डालकर अस्पताल पहुंचाया।समय पर अस्पताल पहुंच जाने से अधिकारी के बेटे की जान बच गई।

लेकिन कहानी यहीं खत्म नही होती।बिल्लू गैंग का एक खबरी दस्ता भी था।इस खबरी दस्ते ने बिल्लू गैंग तक यह खबर पहुंचा दी कि अधिकारी के बेटे को उसके एक रिश्तेदार ने अस्पताल पहुंचाया है।इस बात की भनक लगते ही बिल्लू गैंग हाथ धोकर उस ‘रिश्तेदार’ के पीछे पड़ गया।‘रिश्तेदार’ ने बिल्लू गैंग के भय से घर से निकलना छोड़ दिया।
मगर खतरा टला नही, बिल्लू गैंग लगातार ‘रिश्तेदार’ पर नज़र रखता रहा, खबरी दस्ता भी गैंग को अपनी खबरें पहुंचाता रहा।

आखिर वह बदकिस्मत दिन आ ही गया जब बिल्लू गैंग ने ‘रिश्तेदार’ पर जानलेवा हमला कर दिया।नब्बे के दशक में गर्मियों में लोग अपने घरों की छतों पर सोया करते थे।रोज़ की तरह रात का खाना खाने के बाद ‘रिश्तेदार’ छत पर जैसे ही सोने के लिए पहुंचा तो पड़ोस के घर की छत पर छुपकर बैठे बिल्लू गैंग के सदस्यों ने ‘रिश्तेदार’ पर तेज़धार हथियारों से हमला कर दिया।’रिश्तेदार’ को तड़पता छोड़ बिल्लू गैंग के लोग जैसे आए थे वैसे ही वापस लौट गए।

(यहां यह बताते चलें कि पुराने जम्मू शहर में लगभग सभी मकान एक-दूसरे के साथ इस तरह से जुड़े हुए हैं कि एक-दूसरे की छत फांद कर आराम से आया-जाया जा सकता है।)

‘जाको राखे साईयां मार सके न कोए’ यह कहावत ‘रिश्तेदार’ पर लागू हुई और उसे समय पर उपचार मिलने से उसकी जान बच गई।

यह दो बड़ी घटनाएं बताती हैं कि जम्मू शहर में किस तरह से बिल्लू गैंग ने दहशत फैला रखी थी। ऐसा माना जाता है कि बिल्लू गैंग ने उन दिनों लगभग 25 से 30 आपराधिक घटनाओं को अंजाम दिया।

बिल्लू गैंग की ओर से की गई ज़्यादातर वारदातें पक्का डंगा थाने के क्षेत्राधिकार में हुए।काले की हत्या भी पक्का डंगा पुलिस थाने के क्षेत्राधिकार में ही हुई थी। उल्लेखनीय है कि काले की हत्या में शामिल सभी हमलावर इसी क्षेत्र के रहने वाले थे।लगभग दस साल तक काले की हत्या का बदला लेने के लिए बिल्लू और उसके साथी सक्रिय रहे। इस दौरान काले की हत्या में छोटी सी भूमिका निभाने वाला शख्स भी ज़बरदस्त दहशत में जीता रहा ।

उल्लेखनीय है कि काले की हत्या होने तक जम्मू में अपराध व अपराधियों का दायरा बहुत छोटा था।अपराध जगत में पैसा व ग्लैमर दाखिल नही हुआ था और न ही ज़मीनी विवाद थे।उस समय तक जम्मू शहर की गलियों में चाकूबाजी व हाथापाई आदि होने की घटनाएं होती तो थीं, मगर मुख्य वजहें छेड़ाखानी व आपसी तू-तड़ाक तक ही सीमित थीं।एक मुहल्ले के लड़के दूसरे मुहल्ले में अगर बेवजह घूमते दिखाई दें तो बवाल होना आम था।लड़ाई-झगड़े की मुख्य वजह मुहल्ले की सामान्य ‘दादागिरी’ तक ही सीमित थी।

लेकिन बिल्लू ने यहां अपने भाई का बदला लेने के लिए कई लोगों पर हमले किए वहीं बिल्लू गैंग ने फिरौती व अपहरण आदि की कुछ वारदातें भी की। जम्मू शहर में पहली बार कुछ बड़े व्यापारियों को धमका कर पैसे लेने का सिलसिला भी शुरू हुआ।

 

कई वर्षों तक जम्मू नगर की ज़ुल्म की दुनिया में कईं वारदातों को अंजाम देने वाले बिल्लू का अंत बहुत दर्दनाक ढंग से हुआ।

बिल्लू एक मामले में जम्मू की केंद्रीय जेल में सजा काट रहा था कि उसकी जेल में बंद एक अन्य कैदी ने हत्या कर दी।बिल्लू को मारने के लिए हत्यारे ने सिर्फ एक ‘दातुन’ का इस्तेमाल
किया ।

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