पहली नवरात्रि और रमज़ान के पाक महीने में, पुंछ के एसएचओ अबीद बुखारी ने उत्तर प्रदेश के एक परिवार को उनकी ‘मृत’ माँ ललिता देवी को जीवित लौटाकर एक अविस्मरणीय तोहफा दिया।

 

 

कुछ कहानियाँ यकीन करने से परे होती हैं। ललिता देवी की कहानी भी ऐसी ही है।

उत्तर प्रदेश के एक परिवार ने उन्हें खोया, ढूँढा, रोया — और अंततः सनातन परंपरा के अनुसार उनका अंतिम संस्कार कर दिया। ज़िंदगी, तकलीफ के साथ, आगे बढ़ गई। लेकिन ललिता देवी मरी नहीं थीं। वो बस खो गई थीं।

जम्मू-कश्मीर के सीमावर्ती जिले पुंछ के सुरनकोट कस्बे के बस स्टैंड और बाजारों में एक बुजुर्ग महिला बरसों से भटक रही थी। मानसिक रूप से अस्वस्थ और खुद को पहचानने में असमर्थ, वो उन अनजान लोगों की खामोश दयालुता पर जीवित थी जो उन्हें खाना और सहारा देते थे — अनजाने में उनका एकमात्र परिवार बन गए थे।

 

 

वो दिन जब एक अफसर ने ठहरकर सुना

सुरनकोट थाने के स्टेशन हाउस ऑफिसर इंस्पेक्टर अबीद बुखारी ने जब इस बुजुर्ग महिला को अलग-अलग इलाकों में भटकते देखा, तो उन्होंने दखल देने का फैसला किया।

“आखिरकार मैं उन्हें थाने ले आया और महिला कांस्टेबलों को उनकी देखभाल सौंपी। साथ ही, मैंने नियमित रूप से उनसे बातचीत करना शुरू किया ताकि उनकी पहचान और ठिकाने के बारे में कोई सुराग मिल सके,”

 

“पहले यह बुजुर्ग महिला केवल सुरनकोट शहर में घूमती थी। एक दिन वो एक दूरदराज के गाँव तक पहुँच गई, जहाँ स्थानीय लोगों ने हमें इस मानसिक रूप से अस्वस्थ महिला के बारे में सूचित किया,” बुखारी ने बताया।

उन्होंने पहले स्थानीय NGOs से संपर्क किया कि कोई संस्था इस करीब 80 साल की बुजुर्ग की देखभाल का जिम्मा उठाए — लेकिन कोई तैयार नहीं हुआ।

“आखिरकार मैं उन्हें थाने ले आया और महिला कांस्टेबलों को उनकी देखभाल सौंपी। साथ ही, मैंने नियमित रूप से उनसे बातचीत करना शुरू किया ताकि उनकी पहचान और ठिकाने के बारे में कोई सुराग मिल सके,” उन्होंने कहा।

 

टूटी यादों से बुनी एक पहचान

बार-बार की बातचीत और अथक धैर्य के बाद, ललिता देवी ने एक नाम लिया — उत्तर प्रदेश का एक गाँव, दुज।

“हमारी टीम ने गूगल की मदद से उस गाँव को खोजा, आसपास के इलाकों की पहचान की और अंततः संबंधित पुलिस थाने से संपर्क स्थापित किया,” बुखारी ने बताया।

काफी मेहनत के बाद महिला की पहचान ललिता देवी के रूप में हुई — उत्तर प्रदेश की निवासी। इसके बाद पुलिस ने उनके परिवार को खबर दी।

 

 

वो फोन कॉल — जो मुर्दों को जिला दे

जो परिवार वर्षों से उन्हें मृत मान चुका था, उसके लिए यह खबर किसी वज्रपात से कम नहीं थी — लेकिन खुशी के आँसुओं वाला वज्रपात। बिना एक पल गँवाए, परिवार पुंछ के लिए निकल पड़ा।

जो दृश्य वहाँ था, वो शब्दों में बयान करना मुश्किल है। आँसू, आलिंगन, और उस परिवार का वो अविश्वास जो एक चमत्कार के सामने खड़ा था — जिसकी उम्मीद उन्होंने कब की कब छोड़ दी थी।

“लगता है जैसे 11 साल का वनवास खत्म हुआ। आज हमारे लिए किसी चमत्कार से कम नहीं है।”

परिवार ने एसएचओ बुखारी और सुरनकोट पुलिस का दिल से आभार जताया।

 

 

इंसानियत का संदेश

इस सफल पुनर्मिलन से उत्साहित बुखारी ने मानसिक रूप से अस्वस्थ और अज्ञात व्यक्तियों के प्रति संवेदनशील रवैये की ज़रूरत पर ज़ोर दिया।

“ऐसे लोगों को छोड़ने या नज़रअंदाज़ करने की बजाय हमें मानवीय दृष्टिकोण अपनाना चाहिए, ताकि वो अपने परिवारों से मिल सकें। इस पूरे घटनाक्रम ने ऐसे प्रयासों में मेरी आस्था और मज़बूत कर दी है।”

पहली नवरात्रि की पवित्र बेला और रमज़ान के मुबारक महीने में — जब आस्था और रहमत का संगम होता है — एक मुस्लिम पुलिस अधिकारी ने एक हिंदू माँ को उसके परिवार से मिलाया। यह कहानी सिर्फ एक लापता महिला की वापसी नहीं है — यह इंसानियत की जीत है।

 

 

 

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