● 19 से 21 अक्टूबर तक आयोजित होने वाला चौथा बसोहली उत्सव कला, संस्कृति, विरासत और पर्यटन को देगा नई पहचान

रंजीत सागर झील के मनमोहक तट पर बसा ऐतिहासिक नगर बसोहली केवल एक प्राचीन शहर नहीं, बल्कि डुग्गर भूमि की समृद्ध कला, आस्था, लोक परंपराओं, स्थापत्य, शिल्प और सांस्कृतिक विरासत का जीवंत प्रतीक है। यह वह धरती है जहाँ इतिहास आज भी सांस लेता है और संस्कृति जीवन का अभिन्न हिस्सा बनी हुई है।

सदियों से बसोहली की पहचान इसके प्राचीन मंदिरों, पारंपरिक बावलियों, ऐतिहासिक धरोहरों, लोक संस्कृति, डोगरी गीत-संगीत, स्थानीय व्यंजनों, मौसमी उत्सवों और अपनी विशिष्ट रामलीला से जुड़ी रही है। बदलते समय, उपेक्षा और पलायन के बावजूद इस नगर ने अपनी सांस्कृतिक आत्मा को सहेजकर रखा है।

कला और विरासत की जननी

‘विश्वासस्थली’ के नाम से विख्यात बसोहली भारतीय कला इतिहास में विशेष स्थान रखती है। यह विश्वप्रसिद्ध पहाड़ी लघु चित्रकला (Basohli Painting) की जन्मस्थली और पहली पाठशाला मानी जाती है। लेकिन बसोहली की पहचान केवल चित्रकला तक सीमित नहीं है।

 

डोगरी लोक परंपराएं, लोक साहित्य, हस्तशिल्प, पश्मीना, ऐतिहासिक मंदिर, प्राचीन अवशेष, प्राकृतिक सौंदर्य और शताब्दियों पुरानी खुली रामलीला मिलकर बसोहली को ऐसी विशिष्ट सांस्कृतिक पहचान प्रदान करते हैं, जिसकी मिसाल विरले ही देखने को मिलती है।

यही कारण है कि बसोहली उत्सव केवल एक साधारण सांस्कृतिक आयोजन नहीं, बल्कि इस पूरे क्षेत्र की आत्मा से जुड़ने का अवसर है। यह ऐसा मंच बन सकता है जहाँ पर्यटक केवल कार्यक्रम देखने नहीं, बल्कि बसोहली को महसूस करने आएं और उसकी कला, लोककथाओं, परंपराओं, व्यंजनों, झीलों और प्राकृतिक सौंदर्य से रूबरू हों।

संघर्ष से पुनर्जागरण तक का सफर

बसोहली का यह सफर आसान नहीं रहा।
थीन बांध, जिसे आज रंजीत सागर बांध के नाम से जाना जाता है, के निर्माण ने क्षेत्र के सामाजिक और आर्थिक ढांचे को व्यापक रूप से प्रभावित किया। आसपास के गांवों के विस्थापन और शिक्षा, रोजगार तथा व्यापार की तलाश में लोगों के पलायन ने इस ऐतिहासिक नगर की रौनक को धीरे-धीरे कम कर दिया।

एक समय रंगों, परंपराओं और जीवंत सामाजिक जीवन के लिए प्रसिद्ध बसोहली वर्षों तक उपेक्षा का सामना करती रही।

हालांकि वर्ष 2014 में तत्कालीन रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर द्वारा उद्घाटित अटल सेतु ने क्षेत्र को नई संपर्क सुविधा प्रदान की और बसोहली के पुनरुत्थान की संभावनाओं को नया बल मिला।

बसोहली उत्सव: केवल आयोजन नहीं, एक नई शुरुआत

वर्ष 2023 में शुरू किया गया बसोहली उत्सव एक नए सांस्कृतिक और आर्थिक अध्याय की नींव रखने की क्षमता रखता है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसे किसी कृत्रिम पहचान गढ़ने की आवश्यकता नहीं है। बसोहली स्वयं में एक समृद्ध और विशिष्ट पहचान रखती है।

यह उत्सव चित्रकारों, शिल्पकारों, लोक कलाकारों, कथावाचकों, उद्यमियों और पारंपरिक कारीगरों को मंच प्रदान कर सकता है। साथ ही यह देश-विदेश के पर्यटकों को यहां आने, रुकने और बार-बार लौटकर आने का कारण भी बन सकता है।

होमस्टे, स्थानीय रेस्तरां, परिवहन सेवाएं, पर्यटन गाइड, हस्तशिल्प बाज़ार, कला कार्यशालाएं, पारंपरिक भोजन, सांस्कृतिक प्रस्तुतियां और साहसिक गतिविधियां मिलकर स्थानीय अर्थव्यवस्था को नई गति दे सकती हैं।

विशेष रूप से युवाओं के लिए बसोहली की विरासत केवल गर्व का विषय नहीं, बल्कि रोजगार और उद्यमिता का सशक्त माध्यम भी बन सकती है।

जम्मू के लिए उभरता नया पर्यटन केंद्र

जम्मू क्षेत्र के लिए बसोहली एक बड़ी संभावना प्रस्तुत करती है। यह भविष्य में सांस्कृतिक, ऐतिहासिक, प्राकृतिक और अनुभवात्मक पर्यटन के एक महत्वपूर्ण केंद्र के रूप में विकसित हो सकती है, जो क्षेत्र के पारंपरिक धार्मिक पर्यटन सर्किट को नई दिशा देगा।

एक पर्यटक बसोहली उत्सव में भाग लेने के लिए यहां आए और उसके साथ-साथ पहाड़ी चित्रकला, प्राचीन रामलीला, ऐतिहासिक धरोहरों, मंदिरों, स्थानीय व्यंजनों, हस्तशिल्प, रंजीत सागर झील और आसपास के प्राकृतिक सौंदर्य का अनुभव भी करे, तो यह यात्रा एक अविस्मरणीय अनुभव बन सकती है।

इसी सोच के साथ एक व्यापक “बसोहली सांस्कृतिक पर्यटन सर्किट” विकसित किया जा सकता है, जहाँ उत्सव वार्षिक आकर्षण बने और पर्यटन गतिविधियाँ पूरे वर्ष जारी रहें।

महत्वपूर्ण यह है कि बसोहली को किसी व्यावसायिक भीड़भाड़ वाले पर्यटन स्थल में बदलने के बजाय उसकी मौलिकता, सांस्कृतिक प्रामाणिकता और सामुदायिक भागीदारी को संरक्षित रखते हुए सतत पर्यटन मॉडल विकसित किया जाए।

विरासत से आर्थिक समृद्धि की ओर

बसोहली उत्सव की सफलता केवल इस बात से नहीं मापी जानी चाहिए कि आयोजन में कितने लोग शामिल हुए। वास्तविक सफलता तब होगी जब आगंतुक बसोहली को समझें, स्थानीय होमस्टे में ठहरें, स्थानीय उत्पाद खरीदें, कलाकारों और कारीगरों से जुड़ें, यहां की परंपराओं का अनुभव करें और वर्ष के अन्य समयों में भी यहां लौटकर आएं।

यहीं से कोई उत्सव आर्थिक परिवर्तन का माध्यम बनता है।

बसोहली चित्रकला प्रदर्शनी हॉल से निकलकर कलाकारों के स्टूडियो, कार्यशालाओं और स्थानीय बाजारों तक पहुंच सकती है। पारंपरिक हस्तशिल्प को नए खरीदार मिल सकते हैं। स्थानीय व्यंजन पर्यटन अनुभव का महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकते हैं। लोक कलाकारों और कथावाचकों को नए मंच प्राप्त हो सकते हैं। होमस्टे और स्थानीय उद्यम बढ़ते पर्यटन से सीधा लाभ उठा सकते हैं।

दूसरे शब्दों में कहें तो उत्सव लोगों को बसोहली तक ला सकता है, लेकिन बसोहली की विरासत उन्हें यहां ठहरने और फिर लौटकर आने का कारण दे सकती है।

वर्ष 2023 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा ‘मन की बात’ कार्यक्रम में बसोहली चित्रकला का उल्लेख किए जाने से इस अद्भुत कला परंपरा को राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान मिली और इसकी महत्ता और अधिक रेखांकित हुई।

जम्मू-कश्मीर के लिए बसोहली एक ऐसा अवसर है, जहाँ सांस्कृतिक संरक्षण को पर्यटन, रोजगार, स्थानीय उद्यमिता और आर्थिक विकास की व्यापक रणनीति में बदला जा सकता है।

बसोहली को एक भूला-बिसरा या उपेक्षित नगर मानकर नहीं देखा जाना चाहिए। इसे एक ऐसी अधूरी लेकिन संभावनाओं से भरी पर्यटन गाथा के रूप में देखना चाहिए, जहाँ इतिहास, कला, प्रकृति और समुदाय मिलकर भविष्य की एक अनूठी पहचान गढ़ सकते हैं।

बसोहली केवल एक शहर नहीं है, यह विरासत, संस्कृति और संभावनाओं का ऐसा संगम है जो आने वाले वर्षों में जम्मू-कश्मीर के पर्यटन मानचित्र पर एक नई और विशिष्ट पहचान स्थापित कर सकता है।

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