लद्दाख, जहां वर्षों से पानी की एक-एक बूंद के लिए तरसते रहे लोग अब ग्लेशियरों के बर्बाद होते पिघले पानी को सहेजकर अपनी आर्थिक और सामाजिक तस्वीर बदलने की दिशा में एक ऐतिहासिक छलांग लगा चुके हैं। केंद्र शासित प्रदेश के प्रशासन ने देश में पहली बार इस पैमाने पर हिमनद पिघलन जल के सदुपयोग की ऐसी योजनाएं शुरू की हैं, जिन्होंने न केवल जल संकट को दूर करने की उम्मीद जगाई है, बल्कि शीत मरुस्थल में कृषि पुनर्जीवन और पारिस्थितिक संतुलन बहाल करने का रास्ता भी खोल दिया है।

लेह के निकट स्पितुक फरका में “प्रोजेक्ट हिम सरोवर” के तहत निर्मित चार विशाल तालाब अब हिमनद पिघलन जल से पूरी तरह भर चुके हैं, और यह उपलब्धि महज पांच महीने के रिकॉर्ड समय में हासिल की गई है। दस अप्रैल 2026 को शुरू हुआ यह निर्माण कार्य नौ सितंबर को अपने चौथे और अंतिम तालाब की भराई के साथ पूर्ण हुआ।
पांच महीनों में खड़ा हुआ जल भंडारण का किला
पहला तालाब 21 जून को, दूसरा 19 जुलाई को, तीसरा 24 अगस्त को और चौथा 9 सितंबर को जलमग्न कर परिचालन में लाया गया। साठ मीटर लंबे, चालीस मीटर चौड़े और दो मीटर गहरे इन तालाबों में प्रत्येक की जल भंडारण क्षमता लगभग साठ लाख लीटर है, अर्थात चारों तालाब मिलकर लगभग चौबीस करोड़ लीटर पानी संचित कर सकते हैं।

यह वही पानी है जो पहले स्टोक ग्लेशियर धारा से बहकर व्यर्थ हो जाता था, अब इगू-फे नहर के माध्यम से मोड़कर इन जलाशयों में पहुंचाया जा रहा है। यह तकनीकी सरलता ही इस परियोजना की सबसे बड़ी ताकत बनकर उभरी है।
उपराज्यपाल की प्रतिबद्धता और किसानों के लिए वरदान
लद्दाख के उपराज्यपाल विनय कुमार सक्सेना ने इस उपलब्धि को साझा करते हुए कहा कि यह प्रशासन की पर्यावरणीय सुदृढ़ता, कृषि पुनरुद्धार और स्थायी जल सुरक्षा के प्रति प्रतिबद्धता को दर्शाता है। इस परियोजना से जहां व्यर्थ बहते हिमनद जल का संरक्षण हो सकेगा, वहीं सिंचाई, पारिस्थितिक पुनर्स्थापन और दीर्घकालिक जल सुरक्षा के लिए भी नई राह खुलेगी।
Glad to share a mammoth exercise we have undertaken to revive the majestic glacial lake – Tso Kar in Ladakh, using the pioneering glacier water integration, making it the first-of-its-kind high-altitude ecological restoration project in India.
Utilizing natural gravity flow and… pic.twitter.com/6TSQHSIF4X
— LG Ladakh (@lg_ladakh) September 13, 2026
इससे लगभग एक हजार एकड़ के नए सिंचित क्षेत्र का निर्माण होने की संभावना जताई जा रही है, जो शीत मरुस्थल के किसानों के लिए किसी वरदान से कम नहीं। यह विस्तार आने वाले वर्षों में क्षेत्र की कृषि अर्थव्यवस्था की दशा और दिशा दोनों बदल सकता है।

सिकुड़ती त्सो कार झील को नया जीवन देने की मुहिम
यह सफलता अकेली नहीं है। इससे पहले उपराज्यपाल सक्सेना ने चांगथांग क्षेत्र की दूरस्थ रुपशो खरनाक धारा से हिमनद पिघलन जल को मोड़कर सिकुड़ते त्सो कार झील को पुनर्जीवित करने की एक और महत्वाकांक्षी परियोजना का शुभारंभ किया था। लगभग पंद्रह हजार फुट की ऊंचाई पर स्थित यह झील बीते एक दशक में लगभग सत्तर प्रतिशत तक सिकुड़ चुकी है — कभी लगभग ग्यारह हजार एकड़ में फैली यह झील अब मात्र बत्तीस सौ एकड़ तक सीमित रह गई है।
योजना के अनुसार, रुपशो खरनाक धारा से प्रतिदिन औसतन एक सौ बत्तीस क्यूसेक अर्थात लगभग बत्तीस करोड़ लीटर हिमनद जल, जो अभी तक सिंधु नदी में व्यर्थ बह जाता था, अब त्सो कार झील तक पहुंचाया जाएगा। विशेषज्ञों का अनुमान है कि इस जल के पूर्ण उपयोग से एक ही वर्ष के भीतर झील अपने मूल आकार में वापस लौट सकती है।
विषम परिस्थितियों में भारत की पहली ऐसी पहल
यह परियोजना भारत में अपनी तरह की पहली पहल मानी जा रही है, जो अत्यंत विषम जलवायु परिस्थितियों में किसी उच्च हिमालयी झील के पुनरुद्धार के लिए इतने बड़े पैमाने पर क्रियान्वित की जा रही है। गर्मियों में जहां इस क्षेत्र का तापमान दस डिग्री सेल्सियस से नीचे रहता है, वहीं सर्दियों में यह माइनस बीस से तीस डिग्री तक गिर जाता है।
इस योजना की परिकल्पना उपराज्यपाल सक्सेना ने दस अगस्त को त्सो कार झील की अपनी पहली यात्रा के दौरान की थी, जब स्थानीय ग्रामीणों ने उन्हें झील के तेजी से सिकुड़ने और प्रवासी पक्षियों, विशेषकर दुर्लभ काली गर्दन वाले सारस की घटती संख्या के बारे में अवगत कराया था।

गुरुत्वाकर्षण से बहेगा पानी, तीन गड्ढों से गुजरेगी यात्रा
तकनीकी रूप से यह योजना बेहद सरल किंतु प्रभावी है। हिमनद से झील तक की ढलान पर स्थित तीन प्राकृतिक गड्ढों का उपयोग करते हुए, रुपशो खरनाक धारा का पानी पहले दो सौ सत्तर एकड़ में फैले पहले गड्ढे में, फिर चौबीस एकड़ के दूसरे और दस एकड़ के तीसरे गड्ढे में क्रमिक रूप से प्रवाहित किया जाएगा।
प्रत्येक गड्ढे के निकास पर तीन आरसीसी पाइपों वाला चेक डैम जल स्तर को नियंत्रित करेगा, और अंततः तीसरे गड्ढे से मात्र चार सौ मीटर दूर स्थित त्सो कार झील में पानी को गुरुत्वाकर्षण के माध्यम से बिना किसी कंक्रीट चैनल के, सरल और किफायती तरीके से पहुंचाया जाएगा।
पूरे देश के लिए बनेगा अनुकरणीय मॉडल
गौरतलब है कि यह पहल इसी वर्ष लेह के आसपास सूखी पड़ी कृषि भूमि तक स्टोक ग्लेशियर के नौ करोड़ लीटर पानी की सफल आपूर्ति के बाद शुरू की गई है, और अब इसी मॉडल को लगभग पंद्रह हजार फुट की ऊंचाई पर दोहराने का प्रयास किया जा रहा है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि यह प्रयोग सफल रहा, तो न केवल त्सो कार झील एक बार फिर प्रवासी पक्षियों की चहचहाहट से गूंज उठेगी, बल्कि लद्दाख के शीत मरुस्थल में जल संकट, कृषि संकट और पारिस्थितिक असंतुलन जैसी बहुआयामी चुनौतियों से निपटने का एक स्थायी और अनुकरणीय मॉडल भी पूरे देश के सामने प्रस्तुत होगा।

