लद्दाख प्रशासन ने संघ राज्य क्षेत्र बनने के सात साल बाद पहली बार पंचायत चुनावों की तारीख घोषित कर दी है। राज्य चुनाव आयोग ने 21 नवंबर को मतदान की तारीख तय की है। यह चुनाव 2019 में जम्मू-कश्मीर राज्य से अलग होकर लद्दाख के केंद्रीय शासित प्रदेश बनने के बाद पहला पंचायत चुनाव होगा। साथ ही प्रशासन ने स्वायत्त पहाड़ी विकास परिषदों (एएचडीसी) की सीटें 52 से बढ़ाकर 100 कर दी हैं, जिससे सभी आठ जिलों में अलग-अलग परिषदें बनने का रास्ता साफ हो गया है।

यह कदम उस समय आया है जब लद्दाख में राज्य का दर्जा, छठी अनुसूची के तहत संवैधानिक सुरक्षा और भूमि-नौकरी संरक्षण जैसे मुद्दों पर लंबे समय से आंदोलन चल रहा है। लेह एपेक्स बॉडी (एलएबी) और कारगिल डेमोक्रेटिक अलायंस (केडीए) के नेतृत्व में चल रहे इस आंदोलन के बीच गृह मंत्रालय के प्रतिनिधियों से अगले दौर की वार्ता जल्द होने वाली है। ऐसे में पंचायत और पहाड़ी परिषद चुनावों को सत्ता के विकेंद्रीकरण और स्थानीय लोकतंत्र को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
यूटी बनने की पृष्ठभूमि: खुशी से असंतोष तक का सफर
5 अगस्त 2019 को अनुच्छेद 370 और 35ए को निरस्त कर जम्मू-कश्मीर राज्य को दो भागों में बांटा गया—जम्मू-कश्मीर (विधानसभा वाला यूटी) और लद्दाख (बिना विधानसभा वाला यूटी)। 31 अक्टूबर 2019 से लद्दाख औपचारिक रूप से संघ राज्य क्षेत्र बन गया। लेह के बौद्ध बहुल इलाकों में इसे दशकों पुरानी मांग का पूरा होना बताया गया था। लोग जम्मू-कश्मीर की राजनीति से अलग होकर सीधे केंद्र से जुड़ने और बेहतर विकास की उम्मीद कर रहे थे।
लेकिन खुशी जल्द ही निराशा में बदल गई। लद्दाख को कोई विधानसभा नहीं मिली। प्रशासन पूरी तरह लेफ्टिनेंट गवर्नर और नौकरशाही के हाथों में आ गया। पूर्व में लद्दाख के चार विधायक जम्मू-कश्मीर विधानसभा में और दो विधान परिषद में प्रतिनिधित्व करते थे। अब स्थानीय लोगों को लगा कि भूमि, नौकरियों और सांस्कृतिक पहचान पर सुरक्षा खत्म हो गई है। कारगिल (मुस्लिम बहुल) क्षेत्र में शुरू से ही इस फैसले का विरोध रहा था। धीरे-धीरे लेह और कारगिल दोनों क्षेत्रों के संगठन एकजुट हो गए।

मुख्य मांगें बनीं—पूर्ण राज्य का दर्जा, संविधान की छठी अनुसूची के तहत जनजातीय सुरक्षा (जिससे भूमि, जंगल और सांस्कृतिक अधिकार सुरक्षित रहें), स्थानीय लोगों के लिए नौकरी आरक्षण, और लेह-कारगिल के लिए अलग-अलग संसदीय सीटें। 2023 से गृह मंत्रालय के साथ बातचीत चल रही है। सितंबर 2025 में लेह में हिंसक प्रदर्शन हुए, जिसमें चार लोगों की मौत हो गई और दर्जनों घायल हुए। इसके बाद भी वार्ता जारी है। अक्टूबर 2026 में केंद्र ने अनुच्छेद 371(के) के तहत विशेष सुरक्षा और एक निर्वाचित यूटी-स्तरीय निकाय का मसौदा पेश किया, लेकिन एलएबी और केडीए ने इसे अपर्याप्त बताते हुए खारिज कर दिया। अगला दौर 22 अक्टूबर को दिल्ली में संभावित है।
मुख्य मांगें
पूर्ण राज्य का दर्जा
संविधान की छठी अनुसूची के तहत जनजातीय सुरक्षा (जिससे भूमि, जंगल और सांस्कृतिक अधिकार सुरक्षित रहें).
स्थानीय लोगों के लिए नौकरी आरक्षण.
लेह-कारगिल के लिए अलग-अलग संसदीय सीटें.
पंचायत चुनाव और पहाड़ी परिषदों का विस्तार
लद्दाख राज्य चुनाव आयुक्त सुधांशु पांडेय ने बुधवार को चुनाव कार्यक्रम जारी किया। 26 अक्टूबर को अधिसूचना जारी होगी। उम्मीदवार 2 नवंबर तक नामांकन दाखिल कर सकेंगे, 3 नवंबर को जांच होगी और 5 नवंबर नाम वापसी की अंतिम तारीख होगी। मतदान 21 नवंबर को होगा और प्रक्रिया 30 नवंबर तक पूरी हो जाएगी। मॉडल आचार संहिता तुरंत लागू हो गई है।
लद्दाख में कुल 193 पंचायतें हैं। पिछली बार चुनाव नवंबर 2018 में हुए थे, जब यह क्षेत्र जम्मू-कश्मीर का हिस्सा था और राज्यपाल शासन चल रहा था। अब संघ राज्य क्षेत्र में आठ जिले हैं—लेह, कारगिल, संकू, चांगथांग, नुबरा, शाम, जांस्कर और द्रास।
उसी दिन प्रशासन ने पहाड़ी परिषदों के लिए 100 निर्वाचन क्षेत्र अधिसूचित किए। पहले केवल लेह और कारगिल में दो परिषदें थीं। अब आठों जिलों में अलग-अलग परिषदें होंगी। लेह में 22, कारगिल में 21, संकू में 13, चांगथांग में 10, नुबरा-शाम-जांस्कर में नौ-नौ और द्रास में सात सीटें होंगी। ये पंचायत हलकों और नगरपालिका वार्डों के आधार पर बनाए गए हैं। निर्वाचित पार्षदों की संख्या लगभग दोगुनी हो जाएगी। परिषद चुनावों की तारीख अभी घोषित नहीं हुई है।

विकेंद्रीकरण क्यों जरूरी?
पहाड़ी परिषदें लंबे समय से लद्दाख की राजनीति में स्थानीय विकास, संसाधन प्रबंधन और क्षेत्रीय प्रतिनिधित्व का केंद्र रही हैं। आठ जिलों में अलग परिषदें बनने से हर कोने में प्रतिनिधित्व बढ़ेगा। पंचायत चुनाव ग्रासरूट स्तर पर जनभागीदारी सुनिश्चित करेंगे।
आंदोलनकारी समूहों का कहना है कि बिना विधानसभा और संवैधानिक सुरक्षा के केवल प्रशासनिक बदलाव पर्याप्त नहीं। वे निर्वाचित निकाय को वास्तविक विधायी, कार्यकारी और वित्तीय शक्तियां चाहते हैं। केंद्र इसे सत्ता के विकेंद्रीकरण और लोकतंत्र मजबूत करने का कदम बता रहा है। दोनों पक्षों के बीच विश्वास की खाई अभी बाकी है, लेकिन स्थानीय चुनावों से जनभावना सामने आएगी और वार्ता को नई दिशा मिल सकती है।
राजनीतिक दलों के लिए भी ये चुनाव महत्वपूर्ण हैं। नई परिषद संरचना क्षेत्रीय समीकरण बदल सकती है। आगे पहाड़ी परिषद चुनावों का कार्यक्रम जल्द घोषित होने की उम्मीद है। लद्दाख का भविष्य अब इस बात पर निर्भर करता है कि विकेंद्रीकरण की यह प्रक्रिया स्थानीय आकांक्षाओं को कितना पूरा कर पाती है।




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