लद्दाख केंद्र शासित प्रदेश ने अपने लंबे समय से प्रतीक्षित पंचायत चुनावों का कार्यक्रम घोषित कर दिया है, लेकिन जम्मू-कश्मीर में ग्रामीण स्थानीय निकायों के चुनावों का इंतजार अभी भी जारी है। यहां किसी भी तारीख का कोई संकेत नहीं है।
मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने हाल ही में हल्के अंदाज में कहा कि पंचायत और शहरी स्थानीय निकाय (यूएलबी) चुनाव “उपयुक्त समय” पर कराए जाएंगे। उन्होंने इसकी तुलना केंद्र सरकार के उस वादे से की, जिसमें जम्मू-कश्मीर को राज्य का दर्जा “उपयुक्त समय” पर बहाल करने की बात कही गई है।
इस देरी के कारण केंद्र शासित प्रदेश में फिलहाल कोई भी चुनी हुई स्थानीय शासन संस्था काम नहीं कर रही है। पंचायतों और ब्लॉक विकास परिषदों (बीडीसी) का पांच साल का कार्यकाल 9 जनवरी 2024 को समाप्त हो गया था। नगर निकायों का कार्यकाल इससे पहले अक्टूबर-नवंबर 2023 में पूरा हो चुका था, जबकि जिला विकास परिषदों (डीडीसी) का कार्यकाल 24 फरवरी 2026 को समाप्त हो गया। पंचायती राज व्यवस्था के तीनों स्तर और शहरी स्थानीय निकाय अब चुने हुए प्रतिनिधियों के बिना हैं। जम्मू-कश्मीर में कुल लगभग 4,291 ग्राम पंचायतें हैं, जो इस लंबे अंतराल के कारण प्रभावी रूप से निष्क्रिय पड़ी हुई हैं।

राज्य चुनाव आयोग (एसईसी) ने पूरे केंद्र शासित प्रदेश में पंचायत मतदाता सूचियों का व्यापक संशोधन पूरा कर लिया है। लगभग दो महीने चले इस अभ्यास के बाद अंतिम सूचियां मई में प्रकाशित की गईं।
अधिकारियों के अनुसार, पात्र मतदाताओं की संख्या लगभग 72 लाख पहुंच गई है, जो पिछली सूचियों में करीब 69.80 लाख थी। करीब 3.5 लाख नए मतदाता जोड़े गए और लगभग 1.25 लाख नाम हटाए गए। इस तरह कुल वृद्धि करीब 3.2 प्रतिशत रही। शहरी स्थानीय निकाय चुनावों के लिए मतदाता सूचियां मौजूदा कानूनी प्रावधानों के अनुसार विधानसभा मतदाता सूचियों से तैयार की जाएंगी।
चुनावों में सबसे बड़ी बाधा अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए स्थानीय निकायों में आरक्षण लागू न होना है। एसईसी अभी भी न्यायमूर्ति (सेवानिवृत्त) जनक राज कोतवाल की अध्यक्षता वाले ओबीसी आयोग की रिपोर्ट पर जम्मू-कश्मीर सरकार के जवाब का इंतजार कर रहा है।
सूत्रों के अनुसार, आयोग ने फरवरी 2025 में अपनी रिपोर्ट सौंप दी थी। पंचायतों और नगर निकायों में ओबीसी आरक्षण का प्रतिशत तय करने के लिए इन सिफारिशों का होना जरूरी है, तभी चुनाव अधिसूचित किए जा सकते हैं। लेफ्टिनेंट गवर्नर प्रशासन ने ग्रामीण लोकतांत्रिक संस्थाओं में ओबीसी समुदायों के लिए आरक्षण प्रतिशत की सिफारिश करने हेतु यह आयोग गठित किया था। यह प्रावधान स्वयं संसद द्वारा पारित कानून के माध्यम से लाया गया था, जो उमर अब्दुल्ला सरकार के कार्यभार संभालने से पहले लागू हुआ।
फिलहाल स्थानीय निकायों में आरक्षण केवल अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और महिलाओं के लिए उपलब्ध है। ओबीसी आरक्षण तय होने तक चुनाव प्रक्रिया आगे नहीं बढ़ सकती।
इस बीच लद्दाख में पंचायत चुनाव नवंबर 2026 में कराने का फैसला हो चुका है, जो 2019 में केंद्र शासित प्रदेश बनने के बाद पहला ऐसा चुनाव होगा। जम्मू-कश्मीर में हालांकि चुनावी तैयारी के कई चरण पूरे हो चुके हैं, लेकिन ओबीसी आरक्षण जैसे प्रमुख मुद्दे पर निर्णय लंबित रहने से ग्रामीण और शहरी स्थानीय निकायों का चुनावी शून्य जारी है।


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