नेशनल कॉन्फ्रेंस छोड़ चुके एक नेता के लिए मंगलवार का दिन अपनी शर्तों पर राजनीतिक रंगमंच सजाने का दिन होना था। श्रीनगर-बडगाम संसदीय क्षेत्र से पूर्व सांसद और नेशनल कॉन्फ्रेंस के पूर्व नेता आगा सैयद रूहुल्लाह मेहदी ने इसमें कोई कसर नहीं छोड़ी। उन्होंने अनुच्छेद 370 की बहाली और तुफैल मट्टू की हत्या जैसे उन मुद्दों को पूरे जोर से उठाया, जो कश्मीर की भावनाओं की सबसे संवेदनशील नस को छूते हैं। यह अपने इस्तीफे को जन-सहानुभूति और राजनीतिक पूंजी की लहर में बदलने की सोची-समझी कोशिश थी।
लेकिन तभी जम्मू से आए एक शब्द ने पूरी पटकथा पर पानी फेरने का खतरा खड़ा कर दिया: “आशीर्वाद।”

यह टिप्पणी भाजपा के कद्दावर नेता और गठबंधन की राजनीति के माहिर माने जाने वाले राम माधव की ओर से आई। उन्होंने नेशनल कॉन्फ्रेंस के संकट को औपचारिक रूप से उसका आंतरिक मामला बताया। मगर साथ ही यह भी कह दिया, “हमारे लोगों का उन्हें पूरा आशीर्वाद प्राप्त है, इसीलिए रूहुल्लाह एक और रैली कर रहे हैं।” इसका निहितार्थ समझना कठिन नहीं था: जम्मू-कश्मीर की राजनीति में जो कुछ चल रहा है, उसका किसी न किसी रूप में भाजपा से नाता है।
असर तत्काल हुआ। कुछ ही मिनटों में सत्तारूढ़ नेशनल कॉन्फ्रेंस, जो बीते दिन से बैकफुट पर थी, आक्रामक मुद्रा में आ गई और भाजपा तथा आगा रूहुल्लाह, दोनों पर पलटवार कर दिया।
उपमुख्यमंत्री सुरिंदर चौधरी ने कहा कि पार्टी का रुख हमेशा से यही रहा है कि भाजपा नेशनल कॉन्फ्रेंस को तोड़ने का प्रयास कर रही है। उन्होंने कहा, “आगा रूहुल्लाह के इस्तीफे के तुरंत बाद कल राम माधव का बयान आया। राम माधव ने दावा किया कि आगा रूहुल्लाह के कार्यक्रम में जो लोग पहुंचे, वे दरअसल भाजपा द्वारा भेजे गए थे।”
उल्लेखनीय है कि चौधरी ने रूहुल्लाह पर सीधा हमला करने से परहेज किया, बल्कि उनकी तारीफ भी की। उन्होंने कहा, “आप ये सवाल हमसे क्यों पूछ रहे हैं? जाइए, भाजपा के सुनील शर्मा से पूछिए… आगा रूहुल्लाह एक भले और सम्मानित व्यक्ति थे। भाजपा ने उन्हें गुमराह किया, और कल भाजपा ने खुद स्वीकार कर लिया कि आगा रूहुल्लाह ‘उनके आदमी’ हैं… तो फिर आगा रूहुल्लाह को नेशनल कॉन्फ्रेंस का हिस्सा कैसे माना जा सकता है?… भाजपा हमेशा ऐसे नाटक रचती रहती है।”
ज्यादा तीखी प्रतिक्रिया पार्टी के जमीनी कार्यकर्ताओं की ओर से आई। नेशनल कॉन्फ्रेंस के समर्थक इरशाद मीर ने कहा, “राम माधव के अपने ही शब्दों ने बेनकाब कर दिया कि रूहुल्लाह की चालों की डोर किसके हाथ में है! भाजपा के समर्थन से नेशनल कॉन्फ्रेंस को भीतर से कमजोर करने की कोशिश कामयाब नहीं होगी। हर जमीनी कार्यकर्ता मजबूती से उमर अब्दुल्ला और नेशनल कॉन्फ्रेंस के साथ खड़ा है।”
राम माधव एक दिन के दौरे पर जम्मू पहुंचे थे और त्रिकुटा नगर स्थित भाजपा मुख्यालय में करीब 23 मिनट तक पत्रकारों से मुखातिब रहे। उन्हें पहले से अंदाजा था कि सवाल किस पर होंगे। नेशनल कॉन्फ्रेंस की उथल-पुथल हर पत्रकार के मन में थी, और बैठते ही उन्होंने उसे भांप कर कह दिया, “आपके मन में जो सवाल हैं, मैं उन पर कोई टिप्पणी नहीं करने जा रहा।”
फिर भी यह किनाराकशी ज्यादा देर टिक नहीं सकी। जब नेता प्रतिपक्ष सुनील शर्मा के “आंसू पोंछने” वाले बयान का हवाला देकर उनसे प्रतिक्रिया निकलवाने की कोशिश हुई, तो राम माधव ने रूहुल्लाह की रैली का जिक्र इस तरह किया, मानो वह उनकी अपनी ही पार्टी की रैली हो। साथ ही उन्होंने नेशनल कॉन्फ्रेंस की आंतरिक कलह में भाजपा की किसी भी भूमिका से दो टूक इनकार किया।
यही इस पूरे विवाद का केंद्रीय अंतर्विरोध है। राम माधव ने जोर देकर कहा कि नेशनल कॉन्फ्रेंस की परेशानियों में भाजपा का कोई हाथ नहीं, लेकिन उनके शब्दों ने एनसी को एक बना-बनाया नैरेटिव थमा दिया: भाजपा के आशीर्वाद से बगावत करने वाले रूहुल्लाह। एनसी के लिए यह बयान किसी तोहफे से कम नहीं। वह अपनी एक शर्मनाक अंदरूनी बगावत को बाहरी साजिश का रूप दे सकती है, कार्यकर्ताओं को उमर अब्दुल्ला के पीछे लामबंद कर सकती है और रूहुल्लाह को रक्षात्मक मुद्रा में धकेल सकती है।
रूहुल्लाह के लिए नुकसान गंभीर हो सकता है। उनकी ताकत कश्मीर की भावनात्मक और राजनीतिक आकांक्षाओं की आवाज बनने में थी। एक ऐसे क्षेत्र में, जहां भाजपा की भूमिका आज भी गहरे विवाद का विषय है, “भाजपा के आशीर्वाद” का ठप्पा, चाहे वह उचित हो या नहीं, उनकी इसी छवि पर सीधा प्रहार करता है। यह बयान चूक था, सोची-समझी रणनीति या राजनीतिक गणित की भूल, यह बहस का विषय है। पर रूहुल्लाह को अब उस सवाल का जवाब देना होगा, जिसका सामना वह कभी नहीं करना चाहते थे: आखिर वह किसके आदमी हैं?




