जम्मू-कश्मीर की सत्ता के गलियारों में जिस सन्नाटे को स्थिरता समझा जा रहा था, वह अब दरकता दिख रहा है। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने चंद दिन पहले ही अपने मंत्रिमंडल का विस्तार कर पार्टी के भीतर सुलग रहे असंतोष को शांत करने की कोशिश की थी, लेकिन हुआ इसका उलटा। अब उन्हें अपनी ही पार्टी नेशनल कॉन्फ्रेंस (नेकां) के भीतर खुली बगावत का सामना करना पड़ रहा है। शुक्रवार की शाम श्रीनगर में असंतुष्ट विधायकों ने क़रीब तीन घंटे लंबी बैठक की और उसके बाद मांगों की एक सूची तैयार की, जिसके साथ मुख्यमंत्री और पार्टी नेतृत्व के लिए एक अल्टीमेटम भी जुड़ा बताया जा रहा है।

सूत्रों के मुताबिक़ बाग़ी विधायकों की सबसे बड़ी मांग मुख्यमंत्री के सलाहकार और कुछ मंत्रियों को हटाने की है। फ्रेंड्स एन्क्लेव में लोलाब के विधायक क़ैसर जमशेद लोन के आवास पर हुई इस बैठक में सत्तारूढ़ दल के कम से कम 18 विधायक मौजूद थे। उन्होंने पार्टी के भीतर “सुधार” की लड़ाई लड़ने का संकल्प लिया। उनका कहना है कि वे शासन में अधिक जवाबदेही चाहते हैं और हाल के मंत्रिमंडल फेरबदल में अपनाए गए मापदंडों में पारदर्शिता की मांग करते हैं।

सूत्रों का यह भी कहना है कि छह अन्य विधायक वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के ज़रिये बैठक से जुड़े और उन्होंने इस गुट को अपना समर्थन दिया। इस तरह असंतुष्ट खेमे का दावा 24 विधायकों का है। यह गुट केवल कश्मीर घाटी तक सीमित नहीं है, बल्कि जम्मू संभाग के विधायक भी इसमें शामिल बताए जाते हैं। जो विधायक बैठक में नहीं पहुंच सके, उनके बारे में बताया गया कि कोई कश्मीर से बाहर था, एक विदेश में थे, एक अपने गंभीर रूप से बीमार पिता की तीमारदारी में थे, एक जम्मू में थे और एक स्वयं अस्वस्थ थे।
इन आंकड़ों की सियासी अहमियत समझना ज़रूरी है। 90 सदस्यीय विधानसभा में नेकां के 41 विधायक हैं और उसने कांग्रेस (छह विधायक), छोटे दलों और निर्दलीयों के समर्थन से सरकार बनाई है। यदि 24 विधायकों का दावा सही साबित होता है और यह गुट एकजुट रहता है, तो यह नेकां के अपने विधायक दल का स्पष्ट बहुमत है, और उमर अब्दुल्ला के नेतृत्व के लिए यह एक गंभीर चुनौती बन सकता है।
बैठक में शामिल विधायकों ने “पार्टी को मज़बूत करने” के लिए एकजुट रहने की शपथ ली और एक प्रस्ताव पर हस्ताक्षर किए, जिसमें चार प्रमुख मांगें रखी गई हैं: मुख्यमंत्री के सलाहकार नसीर असलम वानी को हटाया जाए, जिन मंत्रियों को पद पर दो वर्ष पूरे हो चुके हैं उन्हें मंत्रिपरिषद से बाहर किया जाए, और मंत्रिपरिषद का व्यापक पुनर्गठन किया जाए। इसके अलावा विधायक पार्टी घोषणापत्र को लागू करने का स्पष्ट रोडमैप और विधायकों के सशक्तीकरण की भी मांग कर रहे हैं।

गुरेज़ के विधायक नज़ीर गुरेज़ी को एक समिति का प्रमुख चुना गया है, जो इन मांगों को लेकर नेकां अध्यक्ष डॉ. फारूक अब्दुल्ला को ज्ञापन सौंपेगी। सूत्र दावा करते हैं कि गुट का कोई भी सदस्य मंत्री पद नहीं मांग रहा और उनका मानना है कि नए मंत्री पार्टी अध्यक्ष और मुख्यमंत्री की पसंद से चुने जाने चाहिए।
असंतुष्ट विधायकों ने शब्दों का चयन बेहद सोच-समझकर किया। एक विधायक ने कहा, “हम मुख्यमंत्री से मिलकर अपनी मांगें रखना चाहते हैं। हम पार्टी के ख़िलाफ़ नहीं हैं, लेकिन अब पहले जैसा नहीं चल सकता। उन्हें हमारी बात सुननी चाहिए और पार्टी तथा सरकार के हित में बदलाव करने चाहिए।” बैठक में मौजूद एक अन्य विधायक का कहना था, “हमने पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र के लिए संघर्ष की शपथ ली है। हम मुख्यमंत्री के सलाहकार और कुछ मंत्रियों को हटाने, घोषणापत्र लागू करने के रोडमैप और विधायकों के सशक्तीकरण की मांग करते हैं।” एक वरिष्ठ नेता ने कहा, “हम बाग़ी नहीं हैं। हम पार्टी को मज़बूत करना चाहते हैं। बैठक में मौजूद हर व्यक्ति चाहता था कि पार्टी एकजुट रहे। हम केवल जवाबदेही चाहते हैं और यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि पार्टी और सरकार को चंद लोगों की जागीर न समझा जाए।”

बैठक भावनात्मक भी रही। बताया जाता है कि कुछ वरिष्ठ विधायक यह बताते हुए रो पड़े कि पार्टी नेतृत्व और मुख्यमंत्री के सलाहकार द्वारा कथित तौर पर उनके साथ कैसा व्यवहार किया गया। कुछ विधायकों ने शिकायत की कि उनके अपने ही कुछ मंत्रियों और अधिकारियों ने अपमान की सारी हदें पार कर दीं। गुलाबगढ़ के विधायक इंजीनियर खुर्शीद ने आरोप लगाया कि उपमुख्यमंत्री ने उन्हें अपने दफ़्तर से लगभग बाहर निकाल दिया था।
मंत्रिमंडल का हालिया फेरबदल, जिसमें उमर अब्दुल्ला ने चार नए मंत्रियों को शामिल करते हुए नेकां की पुरानी पीढ़ी पर भरोसा जताया, पार्टी की शिकायतें दूर करने वाला क़दम माना जा रहा था। लेकिन ऐसा लगता है कि इसने पार्टी के एक वर्ग में नाराज़गी को और गहरा कर दिया है। विधायकों का सवाल है कि फेरबदल के मापदंड क्या थे और उसका नतीजा इतना एकतरफ़ा क्यों रहा।
पार्टी के लिए समय और भी असहज है। श्रीनगर के सांसद आगा रुहुल्लाह, जिनकी गिनती बेहद लोकप्रिय नेताओं में होती है और जिनके अब्दुल्ला परिवार से रिश्ते लंबे समय से तनावपूर्ण रहे हैं, ने संसद की सदस्यता और पार्टी की प्राथमिक सदस्यता से इस्तीफ़ा देने की घोषणा कर दी है। वे नेकां से अलग होकर अपनी राह बनाने का फ़ैसला कर चुके हैं। एक तरफ़ विधायकों की बगावत और दूसरी तरफ़ रुहुल्लाह की विदाई, यानी पार्टी में दरारें अब ज़मीनी स्तर से लेकर शीर्ष नेतृत्व तक नज़र आने लगी हैं।
इसी उथल-पुथल के बीच एक और घटनाक्रम को पार्टी की अंदरूनी कलह का संकेत बताकर उछाला गया। शुक्रवार को नेकां अध्यक्ष के उस आदेश के सामने आते ही, जिसमें महासचिव का प्रभार कैबिनेट मंत्री अली मोहम्मद सागर को लौटाया गया,

सोशल मीडिया पर अटकलों की बाढ़ आ गई। बहुतों ने इसे डॉ. फारूक अब्दुल्ला का गुस्से में लिया गया फ़ैसला बताया, जिसमें असंतुष्ट विधायक मुबारक गुल से “ताज” छीनकर सागर को सौंप दिया गया। जिन लोगों ने तथ्यों की पड़ताल की, उन्हें हक़ीक़त कुछ और मिली। यह पूरी तरह एक अस्थायी व्यवस्था थी, जो लद्दाख के चुनावों की ज़रूरत से उपजी।
लद्दाख में नवंबर में पंचायत, नगरपालिका वार्ड और पहाड़ी विकास परिषद क्षेत्रों के चुनाव होने हैं और नामांकन की अंतिम तिथियां 2 से 5 नवंबर के बीच हैं।
इसी दौरान इस्लामिक स्कूल कारगिल ने डॉ. फारूक अब्दुल्ला से संपर्क कर जम्मू-कश्मीर नेशनल कॉन्फ्रेंस के चुनाव चिह्न पर उम्मीदवार उतारने की इच्छा जताई, और डॉ. अब्दुल्ला ने सहर्ष सहमति दे दी। नियमों के अनुसार ऐसे उम्मीदवारों को पार्टी के महासचिव और अध्यक्ष के हस्ताक्षर वाला लिखित प्राधिकार पत्र चाहिए, जिसके बिना रिटर्निंग ऑफिसर नामांकन स्वीकार नहीं करते। पार्टी के नामित महासचिव मुबारक गुल मंत्री न बनाए जाने से नाराज़ बताए जाते हैं और इन दिनों पार्टी मुख्यालय नवा-ए-सुबह से दूरी बनाए हुए हैं।
ऐसे में डॉ. अब्दुल्ला ने तत्काल “अगले आदेश तक” महासचिव का प्रभार मंत्री सागर को सौंप दिया। अध्यक्ष फारूक अब्दुल्ला और महासचिव सागर ने इस्लामिक स्कूल कारगिल के प्रत्याशियों के प्राधिकार पत्रों पर हस्ताक्षर कर उन्हें नामांकन के लिए कारगिल भेज दिया। बात बस इतनी थी। विशेष बात यह है कि मुबारक गुल का नाम शुक्रवार की असंतुष्ट विधायकों की बैठक में शामिल लोगों की सूची में भी दर्ज है।
इस बैठक में क़ैसर जमशेद लोन, जावेद मिर्चल, सैफुद्दीन भट, डॉ. सज्जाद शफ़ी, डॉ. बशीर वीरी, मुश्ताक़ गुरु, अब्दुल मजीद लारमी, फारूक अहमद शाह, मुबारक गुल, नज़ीर गुरेज़ी, एजाज़ जान, मुज़फ्फर इक़बाल खान, जावेद इक़बाल चौधरी, अर्जुन सिंह राजू, हिलाल अकबर लोन, खुर्शीद अहमद (गुलाबगढ़), हसनैन मसूदी और ग़ुलाम मोहिउद्दीन मीर शामिल हुए।
अब सबकी निगाहें इस पर टिकी हैं कि उमर अब्दुल्ला और डॉ. फारूक अब्दुल्ला संवाद का रास्ता चुनते हैं, कुछ मांगें मानकर असंतोष की आग पर पानी डालते हैं, या अपने रुख़ पर अड़े रहते हैं। असंतुष्ट विधायक भले ही ख़ुद को बाग़ी मानने से इनकार करें, लेकिन उनका संदेश साफ़ है। सलाहकार, उपमुख्यमंत्री और मंत्रिमंडल का भावी स्वरूप अब सियासी सौदेबाज़ी की मेज़ पर रखे जा चुके हैं, और एकता के नारे पर सत्ता में आई पार्टी सरकार बनने के बाद के अपने सबसे कठिन आंतरिक इम्तिहान के सामने खड़ी है।




